Wednesday, 29 September 2021

अवैध हथियार के साथ सज्जाद सराडी गिरफ्तार

कुख्यात #अपराधी #सज्जाद_सराडी को अवैध #पिस्टल के साथ पुलिस ने किया #गिरफ्तार
✍️ सलूम्बर ब्लॉग. 
उदयपुर जिले के कुख्यात अपराधी सराड़ा हाल उदयपुर निवासी सज्जाद सराडी को पुलिस ने अवैध हथियार के साथ बुधवार को गिरफ्तार किया।

कार्रवाई पुलिस के जिला विशेष दल (डीएसटी) प्रभारी दिलीप सिंह के नेतृत्व में की गई। मुखबिर की सूचना पर पुलिस दल ने सवीना में घेराबन्दी की और उसके कब्जे से एक अवैध पिस्टल व 5 जिंदा कारतूस बरामद किए।

साथ ही सज्जाद को हिरासत में लेकर सवीना पुलिस के सिपुर्द किया। उल्लेखनीय है कि आदतन अपराधी सज्जाद पर हत्या, हत्या के प्रयास, अवैध वसूली, आर्म्स एक्ट सहित अन्य धाराओं में करीब 30 प्रकरण दर्ज है। वह कोर्ट से जमानत पर बाहर आया हुआ था।
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#sajjad #saradi #dst

Tuesday, 28 September 2021

वल्लभनगर, धरियावद सीट : उप चुनाव कार्यक्रम घोषित - 30 अक्टूबर को होगा मतदान, 2 नवम्बर को आएंगे नतीजे

✍️ सलूम्बर ब्लॉग. भारत निर्वाचन आयोग ने मंगलवार को लोकसभा और विधानसभा सीटों के उप चुनाव कार्यक्रम की घोषणा कर दी है। सभी सीटों पर ईवीएम से मतदान होगा।

इसके तहत राजस्थान में विधानसभा की सिर्फ दो सीटों पर उप चुनाव होंगे जो कि उदयपुर संभाग में आती है। यह दोनों सीटें उदयपुर जिलान्तर्गत 155-वल्लभनगर और प्रतापगढ़ जिले की 157-धरियावद (एसटी) है।

इसे लेकर आयोग के सचिव संजीव कुमार प्रसाद ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर विस्तृत चुनाव कार्यक्रम बताया है। इसके तहत राजस्थान की उक्त दोनों सीटों के लिए शुक्रवार 1 अक्टूबर 2021 को चुनावी अधिसूचना जारी की जाएगी।

नामांकन दाखिले की अंतिम तिथि 8 अक्टूबर रहेंगी और 13 अक्टूबर तक नाम वापसी हो सकेगी। इसके बाद शनिवार 30 अक्टूबर को मतदान होगा और मंगलवार 2 नवम्बर 2021 को मतगणना कर नतीजे घोषित किये जायेंगे।

ज्ञातव्य हैं कि वल्लभनगर विधायक गजेंद्र सिंह शक्तावत (कांग्रेस) और धरियावद गौतम लाल मीणा (भाजपा) का पिछले दिनों कोरोना से निधन हो गया था। तब से दोनों सीटें रिक्त हैं।

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12 वें सलिला साहित्य सम्मान हेतु रचनाकारों की घोषणा

✍️ सलूम्बर ब्लॉग
#सलिला संस्था, सलूंबर-राजस्थान द्वारा 12वें सलिला साहित्य सम्मान वर्ष 2021 की घोषणा सोमवार को हुई। इस साल सर्वोच्च "सलिला शिखर सम्मान" सुजाता चौधरी, भागलपुर, बिहार को उनके द्वारा रचित गांधी साहित्य पर अर्पित किए जाने की घोषणा की गई है। सुजाता चौधरी यह सम्मान लेने वाली चौथी रचनाकार होंगी।
            (चित्र : चयनित रचनाकार)
संस्था अध्यक्ष डॉ. विमला भंडारी ने बताया कि सलिला साहित्य रत्न सम्मान के तहत हिंदी उपन्यास शुन्यनाथ की मुस्कान, लेखक अमृतलाल मदान, कैथल (हरि.) और राजस्थानी उपन्यास काया री कळझळ, संतोष चौधरी, जोधपुर (राज.) को चयनित किया गया है।

हिंदी कहानी की पुस्तक गली आगे मुड़ती है, सुधा जुगरान, देहरादून और राजस्थानी कहानी की पुस्तक, काडर चेंज लेखक ओम प्रकाश तंवर, चूरू (राजस्थान) की पुस्तक का चयन हुआ है।

संस्था की चयन समिति ने हिंदी बाल कविता की पुस्तक, हम तो बच्चे हैं लेखिका कुमुद वर्मा, अहमदाबाद (गुजरात) लोककथा पर बाल साहित्य की पुस्तक, नागालैंड की लोककथाएं, सुमन बाजपेयी, दिल्ली को चयनित किया है।

उपरोक्त विधागत पुस्तकों के साथ शोधपत्रिका सृजन कुंज, त्रैमासिक के नवंबर 2019 के बाल साहित्य विशेषांक की अतिथि संपादक नवज्योत भनोत, श्रीगंगानगर (राजस्थान) को चयनित किया गया। सभी घोषित सम्मान संस्था द्वारा आगामी दिनों तय तारीख को प्रदान किये जायेंगे।
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#SalumbarBlog #salilasanstha

Sunday, 19 September 2021

अनंत चतुर्दशी व्रत का इतिहास और महत्व

बिहारीलाल पुरोहित.
भारतीय व्रतों का अपना विधान है। प्रायश्चित से लेकर पुण्य अथवा मनोरथ की सिद्धि व्रतों के पालन के मूल में रही है। व्रतों की संख्‍या किसी के लिए तो गिन पाना बहुत मुश्किल है। व्रतराज, व्रतार्क जैसे निबंधकार के लिए भी यह संख्‍या अगणित रही, उसने करीब पंद्रह सौ व्रतों का उल्‍लेख किया है।

कई बार लगता है कि तीन सौ पैंसठ दिनों में इतने व्रत कैसे आ जाते होंगे! एक जन्‍म भी कम पडता है, इन व्रतों के पालन के लिए। यही वजह है कि धर्मावलम्बी महिलाओं का यह मत होता हैं - जितने सिर पर केश होते हैं, उतने ही व्रत करने होते हैं।

पुराविद डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार
अनंत चतुर्दशी का व्रत अनंत के नाम पर किया जाता है। इसे अणत चौदस भी कहा जाता है। यह मूलत: नाग संस्‍कृति का परिचायक है। नाग संस्‍थान का वर्णन महा पुराणों, पुराणों और उपपुराणों, औपपुराणों में ही नहीं, बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी मिलता है।

'अनंत' और कोई नहीं, नाग का ही नाम है जिसके फण अनंत हों किंतु जब से भगवान श्री नारायण की विशिष्ट मान्‍यता हुई, अनंत को उनका शयन, आसन स्‍वीकारा गया और यह व्रत अनंतशायी विष्‍णु के नाम हो गया।

(चित्र : सूती धागे की अणत)

मूलत: यह चौदह गांठ का डोरा बनाकर भुजा पर बांधने की परंपरा पर आधारित व्रत था। मध्यकालीन भविष्‍यपुराण के व्रतों में इस व्रत के विधान और फल को लिखा गया है।

चौदस का दिन, चौदह गांठ वाला डोरा, चौदह साल तक करने का विधान और चौदह जनों को भोजन करवाने और फिर चौदह वस्तु दान कर उद्यापन करने जैसी परंपरा है।

(चित्र : रेशमी धागे की अणत)

चौदह की संख्‍या हमारे यहां चौदह मनु, चौदह इंद्र, चौदह मर्यादा, चौदह भुवन, चौदह वर्ष आदि के साथ जुड़ी हुई है। कहीं न कहीं यह संख्‍यावाची व्रत भी है।

तिथि में चौदस का अपना महत्व है और उसका प्रसार अरब तक भी रहा है। तिथियों की देवता के साथ संबद्धता अनेक पक्षों को लिए है जैसा कि वराहमिहिर (587 ई.) ने समास संहिता के तिथि गुणाध्याय में माना है।

भविष्‍यपुराण की कथा में कौंडिन्‍य की कथा है और उसमें दान की महिमा बताई गई है। दो बहनें थीं। दोनों परस्‍पर ही दान करती थी, ऐसे में वे बावड़ियां बनीं। एक लबालब हो जाती तो उसका पानी दूसरी में चला जाता, दूसरी भर जाती तो उसका पानी पहली में चला जाता...।

कुल मिलाकर यह व्रत पश्चिमी भारत के उस मरुकांतार क्षेत्र से संबंद्ध रहा है जहां पानी कम था। विदिशा से लेकर माध्‍यमिका तक कभी नागों का वर्चस्‍व था, इसलिए चित्‍तौड के पास मिले 8वीं सदी के पुठौली अभिलेख में कहा गया है समुद्र मंथन से थके हुए मातोली सर्पराज ने इधर आश्रय लिया था...।

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#anantchaturdashi #अनंतचतुर्दशीव्रत #अणतचौदस

Tuesday, 14 September 2021

हिंदी लिपि की कहानी : 'नन्दिनागरी' देवनागरी लिपि का पूर्व और प्रारम्भिक रूप

✍️ डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' 
मोबाइल, नेट के दौर में आज हिंदी को भी विदेशी लिपि में लिखने की अनावश्‍यक परम्‍परा चल पड़ी है। तब याद आते है,  पुराणाें और उपपुराणों मे इसको नन्दिनागरी लिपि में लिखने के निर्देश। 
(चित्र : नंदीनागरी में लिखित एक पांडुलिपि का अंश)

संस्कृत हो या अपभ्रंश या पैशाची जैसी पूर्व भाषाएं। हमारे पुराणाें और उपपुराणों में हमारी भाषाओं को प्रारम्‍भ में जहां ब्रह्माक्षर या ब्राह्मी। (सन्‍दर्भ - शिवधर्मपुराण) में लिखने का निर्देश हैं, वहीं बाद में नन्दिनागरी लिपि में लिखने का निर्देश मिलता है। 

यह देवनागरी लिपि का पूर्व और प्रारम्भिक रूप है। उत्‍तर गुप्‍तकालीन देवीपुराण, शिवधर्मोत्‍तर पुराण और अग्निपुराण में नन्दिनागरी लिपि का सन्‍दर्भ मिलता है। इस लिपि के शिलालेख, पांडुलिपियां, ताम्रपत्र भी देखने में आते है।नन्दिनागरी ही एक ऐसी लिपि है जिसको देह पर गुदवाया जाता है। राम नामी की महत्ता भी इसी लिपि के कारण है।
(चित्र : नंदिनागरी लिपि में देह पर गुदाई और राम नामी ओढ़े महिला-पुरुष)

देवीपुराण में कहा गया है कि नन्दिनागरी लिपि बहुत सुन्‍दर है और इसका व्‍यवहार समस्‍त वर्णों को ध्‍यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी वर्ण और उसके अंश को भी तोड़ना नहीं चाहिए। अक्षरों को हल्‍का भी नहीं लिखना चाहिए न ही कठोर लिखना चाहिए।

हेमाद्रि (1260 ई.) ने भी इन श्‍लोकों को चतुर्वर्ग्‍ग चिन्‍तामणि में उद्धृत किया है-
नाभि सन्‍तति विच्छिन्‍नं न च श्‍लक्ष्‍णैर्न कर्कशै:।। 
नन्दिनागरकैव्‍वर्णै लेखयेच्छिव पुस्‍तकम्।। 
प्रारभ्‍य पंच वै श्‍लोकान् पुन: शान्तिन्‍तु कारयेत्। (देवीपुराण 91, 53-54 एवं शिवधर्मोत्‍तर)

पुस्‍तकों के लिखने के सन्‍दर्भ में यही मत अग्निपुराणकार ने भी प्रस्‍तुत किया है। नन्दिपुराण में कहा गया है कि स्‍याही का उचित प्रयोग करना चाहिए और वर्णों के बाहरी-भीतरी स्‍वरूपों को सही-सही प्रयोग करना चाहिए। उनको सुबद्ध करना चाहिए, रम्‍य लिखना चाहिए, विस्‍तीर्ण और संकीर्णता पर पूरा ध्‍यान देना चाहिए। (दानखण्‍ड अध्‍याय 7, पृष्‍ठ 549)
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#नंदिनागरी #देवनागरी #हिन्दीलिपि #नंदीपुराण #nandinagari #nandipuran

भगवान बलराम जयंती : जानिए कृषि देवता के जीवन, चरित्र की विशेषताएं

✍️ नरोत्तम पुरोहित.
भादौ मास के शुक्ल पक्ष की षष्टी तिथि को भगवान बलराम या बलभद्र का जन्म हुआ था। बलराम रोहिणी-वसुदेव के पुत्र और भगवान श्री कृष्ण के सौतेले अग्रज भ्राता है। उन्होंने रेवती से विवाह किया। एक किसान परिवार में जन्म लेने के बाद कृष्ण ने पशुपालन और बलराम ने वैज्ञानिक, उन्नत कृषि पर अविस्मरणीय कार्य किये थे।
(चित्र : हल, मूसल के साथ भगवान बलराम)

उन्होंने प्राकृतिक रूप से उपजी फसलों का बीज उत्पादन और नहर के माध्यम से फसलों की सिंचाई का आविष्कार किया था। जिससे बलराम को पृथ्वी का प्रथम नहर व बीज वैज्ञानिक भी माना जाता है।

बलराम ने अस्त्र के रूप में हल व मूसल को धारण किया था इसलिए इन्हें हलधर भी कहते है। अपने औजार रूपी अस्त्रों से बुवाई व फसल निकालने के साथ शत्रुओं का संहार भी करते थे।

बलराम का राष्ट्रीय चरित्र बहुत ऊंचा था।
उन्होंने अपने व्यक्तिगत अहंकार की जगह राष्ट्र को सर्वोपरि मान कर ही पुरुषार्थ किया। अपने राष्ट्र को जन-धन हानि के संकट से बचाने के लिए उन्होंने जरासंध के साथ युद्ध में आत्म समर्पण कर राष्ट्रवादी चरित्र का परिचय दिया।

महाभारत युद्ध के दौरान समूचे राष्ट्र के राजा व सेनाएं किसी न किसी पक्ष की ओर से युद्ध के मैदान में थे। ऐसे में बलराम किसी का पक्ष लिये बगैर तीर्थाटन के लिए निकल गए थे। उनका यह निर्णय गैर राजनीतिक चरित्र को दर्शाता है।

काश्तकारी के प्रतीक हल व मूसल को अस्त्र स्वीकार करके हलधर कहलाने वाले, प्रथम बीज, नहर वैज्ञानिक, राष्ट्रवादी आदि चारित्रिक विशेषताओ से अंगीकृत भगवान बलराम को लोक में कृषि देवता के रूप में स्वीकार किया।
(चित्र : भगवान बलभद्र का 17वीं शताब्दी का एक भित्ति चित्र)

तब से ही भगवान बलराम के जन्मदिन मतलब भादौ मास के शुक्ल पक्ष की षष्टी को गांवों और मुख्यतः पशुपालक, काश्तकार वर्ग में बड़े उल्लास के साथ त्यौहार के रूप में मनाया जाता है।
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#बलराम #बलभद्र #हलधर #बलरामजयंती

आज हिंदी दिवस : मातृ भाषा की पालना के लिए निष्ठा की आवश्यकता

ज्ञान प्रकाश सोनी. उदयपुर
भारत के संविधान का अनुच्छेद ३५१ यह निर्देश देता है कि संघ (सरकार) का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार करे और पर्यायवाची शब्दों के लिये मुख्यतः संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं का सहारा ले।

इस कर्तव्य की पूर्ति के लिये सन् १९६० में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना की गई लेकिन बीते साठ सालों में यह कर्तव्य निभाने में जितनी निष्ठा होनी चाहिए थी वह नहीं रही है।

इस कोविड काल को ही लें तो “सोशल डिस्टैंस”, “आइसोलेशन”, “क्वारैंटाइन”, “वैक्सीन” जैसे कई अंग्रेज़ी शब्दों को बढ़ावा दिया गया है।

जबकि संस्कृत आधारित हिंदी पर्याय आसानी से अपनाए जा सकते थे। सरकार ने अपने ही संस्थान, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय की सहायता इस बारे में नहीं ली है।

यदि सामाजिक दूरी, एकांतवास, एकांतित, टीका, टीकाकरण, आदि शब्द अपनाए जाते तो हिंदी के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रचलित हो जाते।

चाहे संविधान हो, चाहे क़ानून, हम प्रावधान तो बहुत आदर्श रूप से करते हैं पर इनकी पालना में निष्ठा बहुत कम। इस परिपाटी को बदलना समय की आवश्यकता है।

Sunday, 12 September 2021

उदयपुर सांसद मीणा को दिल्ली में 'अटल रत्न' पुरस्कार से नवाजा

उदयपुर सांसद मीणा को दिल्ली में 'अटल रत्न' पुरस्कार से नवाजा

सामाजिक संस्था "संकल्प एक नई सोच" की ओर से कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया, स्पीकर हॉल दिल्ली में गत दिवस
डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की स्मृति में राष्ट्र गौरव पुरस्कार वितरण समारोह हुआ।

संस्था के अध्यक्ष जितेंद्र शर्मा "बॉक्सर" ने बताया की इसी क्रम में उदयपुर से लोकसभा सांसद अर्जुन लाल मीणा को बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ अभियान में किये गए उल्लेखनीय कार्यों के चलते "अटल रत्न" सम्मान से नवाजा गया।
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#arjunlalmeena #atalratnapuraskar #mp #india

Saturday, 11 September 2021

जानिए ऋषि पंचमी और पौराणिक औषधीय धान्य सांवा का महत्व


✍️ बिहारीलाल पुरोहित 
गणेश चतुर्थी का अगला दिन यानी भादौ मास की शुक्ल पंचमी, इसे ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। मेवाड़ अंचल में यह दिन 'हामा पाचम' के रूप में भी माना और जाना गया है। सांवा, सामा या हामा वनस्पति की पूजन परम्परा और इससे निपजे धान्य के सेवन के महत्व से यह नाम व्यवहार में आया।

भारतीय स्त्रियों के लिए व्रत, पूजन, कथा श्रवण से लेकर संयमित खाद्य सेवन से यह तिथि महत्वपूर्ण मानी गई है। पुराविद डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू बताते है कि इस पंचमी का पौराणिक महत्व है। इस दिन व्रतार्थी महिलाएं अपने घर के आसपास खड़ी वनस्‍पति को खोजने जाती थी। वापसी में सांवा, मलीचि, अपामार्ग, दूर्वा आदि उखाड़कर ले आती।

बिना हांके, बोए स्वतः उगने वाली विशिष्ट वनस्पति को व्रतार्थी घर पर पीले परिधान या धागों में लपेटती हैं और विधान पूर्वक कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ सप्त ऋषि का पूजन, स्मरण किया जाता है। इनमें से अधिकांश ऋषियों का सम्बन्ध प्राचीन कृषि ज्ञान-विज्ञान से रहा है।
मानव सभ्यता में सांवा धान्‍य प्रारंभिक खाद्य औषधि के रूप में माना गया। पौराणिक कथा में एक ब्राह्मण रजस्वला स्त्री व उसके पति को ऋषियों का श्राप मिलने के उल्लेख आते है। ऋषियो के शाप से मुक्ति, रजस्वला काल मे हुई भूल चूक के प्रायश्चित, मासिक धर्म संबंधी रोग, दोष निवारण के प्रसंग भी है।

वैसे व्रतार्थी को इस दिन सिर्फ सांवा अथवा बगैर कटे फल सेवन करने के उपदेश मिलते है। सांवा को दही के साथ अलुणा और दूध के साथ फीका ही सेवन करने की परंपरा रही है। मगर आजकल इसकी हल्की मसालेदार खिचड़ी, मिठी खीर खाई जाने लगी है। अगले दिन 7 साधुओं या 7 ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ व्रत का पारणा किया जाता है।

(चित्र : सांवा की हरी पौध और इससे निपजे धान्य की बिक्री) Salumbar Blog
#ऋषिपंचमी #सामापाचम #हामापाचम #सांवा #सामा #हामा

Friday, 10 September 2021

बड़ा गणपति को इसलिए कहते है मसाणिया गणपति

बिहारीलाल पुरोहित
सलूंबर नगर को दो भागों में बांटने वाला, ह्रदय स्थल गांधी चौक क्षेत्र में प्राचीन श्री बड़ा गणपति मन्दिर सदियों से आस्था का केंद्र है। रियासतकाल में यह क्षेत्र नगर का आखिरी छोर हुआ करता था और शमसान भूमि यानी मसान था। जिससे क्षेत्र के कई बुजुर्ग इसे आज भी मसानिया गणपति या मसाणिया गणेश के नाम से भी पुकारते है।

इस मंदिर के शिखर पर विधान पूर्वक ध्वज-कलश स्थापना का कार्य करीब 8 वर्ष पूर्व हुआ। नगर में गणेश चतुर्थी पर दर्शन के लिए सबसे ज्यादा रेलमपेल यही पर रहती है। इस दिन अभिजीत मुहूर्त में धूमधाम से ध्वजा परिवर्तित की जाती है। तीज-त्योहार से लेकर अन्य दिनों निकलने वाली शोभायात्रायो, धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक जुलूसों का अस्थाई मुकाम, ठहराव इस मंदिर पर जरूर सुनिश्चित किया जाता है।

इस प्राचीन मंदिर के सैकड़ों नियमित श्रद्धालु है। खासकर प्रत्येक बुधवार को यहां सुबह शाम के समय इनके आने का क्रम लगा रहता है। विवाह सहित अन्य मांगलिक कार्य की शुरुआत में सबसे पहला न्यौता यहां गणपति के चरणों में अर्पित करते हैं। कई लोग नव युगल को धोक लगाने नए वाहन को भी पूजा के लिए लाते हैं।

प्रतिवर्ष गणेश चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी तक पूरे मन्दिर को फूलों से सजाया जाता है। रोजाना शोडोपचार पूजा विधान होता है। अनंत चतुर्दशी पर कम से कम पांच हजार मोदक का भोग धराकर श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया जाता है।

चित्र: सलूंबर के प्राचीन श्री बड़ा गणपति मंदिर में गणेश चतुर्थी पर भगवान का रजत श्रंगार।
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अधिवक्ता सुरक्षा कानुन लागु करने की मांग

 सीएम के नाम एसडीओ को सौपा ज्ञापन


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Wednesday, 8 September 2021

सलुम्बर में गणेश चतुर्थी को लेकर तैयारीया जोरो पर.

सलुम्बर में गणेश चतुर्थी को लेकर तैयारीया जोरो पर



शहर सहित क्षैत्र मे भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को मनाये जाने वाले गणेष चतुर्थी पर्व को लेकर तैयारीया जोरो पर है। गणेष मंदिरो मे साफ सफाई धुलाई के साथ रंग रोगन का कार्य अन्तिम चरणो मे किया जा रहा है। शुक्रवार 10 सितम्बर को मनाई जाने वाली गणेष चतुर्थी को लेकर क्षैत्रवासियो मे खासा उल्लास देखा जा रहा है। उदयपुर रोड़ पर बनाई जा रही गणेष प्रतिमाओ के स्थल पर लोगो की प्रतिमा बुकिंग के लिए भीड लग रही है। हालाकि कोरोना गाईड लाईन के चलते सार्वजनिक स्थलो पर गणेष महोत्सव के पाण्डाल नही बन रहे है। लेकिन गणराज के श्रृद्धालु विग्नहर्ता को घरो मे विराजित करने के लिए तैयारीया करते नजर आ रहे है। श्री बड़ा गणपति मंदिर, रूप गणपति मंदिर, मन्षापुर्ण गणपति मंदिर, सिद्धीविनायक मंदिर सहित गणेष मंदिरो मे चौथ के आयोजन को लेकर विषेष तैयारीया हो रही है। गणेश चौथ को लेकर श्री बड़ा गणपति महाराज के मंदिर को फुलो से सजाया जाएगा। और चौथ के दिन शुक्रवार दोपहर अभिजित मुहुर्त मे मंदिर गुम्बद पर ध्वजा परिवर्तित कि जाएगी। चौथ से चतुर्थदषी तक प्रतिदिन भगवान की शोडोपचार पुजा कर संध्याकाल मे महा आरती उतारी जाएगी।


शरद पूर्णिमा के लिए पौराणिक भारतीय आयुर्वेद का विशेष योग

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