बिहारीलाल पुरोहित.
भारतीय व्रतों का अपना विधान है। प्रायश्चित से लेकर पुण्य अथवा मनोरथ की सिद्धि व्रतों के पालन के मूल में रही है। व्रतों की संख्या किसी के लिए तो गिन पाना बहुत मुश्किल है। व्रतराज, व्रतार्क जैसे निबंधकार के लिए भी यह संख्या अगणित रही, उसने करीब पंद्रह सौ व्रतों का उल्लेख किया है।
कई बार लगता है कि तीन सौ पैंसठ दिनों में इतने व्रत कैसे आ जाते होंगे! एक जन्म भी कम पडता है, इन व्रतों के पालन के लिए। यही वजह है कि धर्मावलम्बी महिलाओं का यह मत होता हैं - जितने सिर पर केश होते हैं, उतने ही व्रत करने होते हैं।
पुराविद डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू के अनुसार
अनंत चतुर्दशी का व्रत अनंत के नाम पर किया जाता है। इसे अणत चौदस भी कहा जाता है। यह मूलत: नाग संस्कृति का परिचायक है। नाग संस्थान का वर्णन महा पुराणों, पुराणों और उपपुराणों, औपपुराणों में ही नहीं, बौद्ध और जैन ग्रंथों में भी मिलता है।
'अनंत' और कोई नहीं, नाग का ही नाम है जिसके फण अनंत हों किंतु जब से भगवान श्री नारायण की विशिष्ट मान्यता हुई, अनंत को उनका शयन, आसन स्वीकारा गया और यह व्रत अनंतशायी विष्णु के नाम हो गया।
(चित्र : सूती धागे की अणत)
मूलत: यह चौदह गांठ का डोरा बनाकर भुजा पर बांधने की परंपरा पर आधारित व्रत था। मध्यकालीन भविष्यपुराण के व्रतों में इस व्रत के विधान और फल को लिखा गया है।
चौदस का दिन, चौदह गांठ वाला डोरा, चौदह साल तक करने का विधान और चौदह जनों को भोजन करवाने और फिर चौदह वस्तु दान कर उद्यापन करने जैसी परंपरा है।
(चित्र : रेशमी धागे की अणत)चौदह की संख्या हमारे यहां चौदह मनु, चौदह इंद्र, चौदह मर्यादा, चौदह भुवन, चौदह वर्ष आदि के साथ जुड़ी हुई है। कहीं न कहीं यह संख्यावाची व्रत भी है।
तिथि में चौदस का अपना महत्व है और उसका प्रसार अरब तक भी रहा है। तिथियों की देवता के साथ संबद्धता अनेक पक्षों को लिए है जैसा कि वराहमिहिर (587 ई.) ने समास संहिता के तिथि गुणाध्याय में माना है।
भविष्यपुराण की कथा में कौंडिन्य की कथा है और उसमें दान की महिमा बताई गई है। दो बहनें थीं। दोनों परस्पर ही दान करती थी, ऐसे में वे बावड़ियां बनीं। एक लबालब हो जाती तो उसका पानी दूसरी में चला जाता, दूसरी भर जाती तो उसका पानी पहली में चला जाता...।
कुल मिलाकर यह व्रत पश्चिमी भारत के उस मरुकांतार क्षेत्र से संबंद्ध रहा है जहां पानी कम था। विदिशा से लेकर माध्यमिका तक कभी नागों का वर्चस्व था, इसलिए चित्तौड के पास मिले 8वीं सदी के पुठौली अभिलेख में कहा गया है समुद्र मंथन से थके हुए मातोली सर्पराज ने इधर आश्रय लिया था...।
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