Tuesday, 14 September 2021

हिंदी लिपि की कहानी : 'नन्दिनागरी' देवनागरी लिपि का पूर्व और प्रारम्भिक रूप

✍️ डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू' 
मोबाइल, नेट के दौर में आज हिंदी को भी विदेशी लिपि में लिखने की अनावश्‍यक परम्‍परा चल पड़ी है। तब याद आते है,  पुराणाें और उपपुराणों मे इसको नन्दिनागरी लिपि में लिखने के निर्देश। 
(चित्र : नंदीनागरी में लिखित एक पांडुलिपि का अंश)

संस्कृत हो या अपभ्रंश या पैशाची जैसी पूर्व भाषाएं। हमारे पुराणाें और उपपुराणों में हमारी भाषाओं को प्रारम्‍भ में जहां ब्रह्माक्षर या ब्राह्मी। (सन्‍दर्भ - शिवधर्मपुराण) में लिखने का निर्देश हैं, वहीं बाद में नन्दिनागरी लिपि में लिखने का निर्देश मिलता है। 

यह देवनागरी लिपि का पूर्व और प्रारम्भिक रूप है। उत्‍तर गुप्‍तकालीन देवीपुराण, शिवधर्मोत्‍तर पुराण और अग्निपुराण में नन्दिनागरी लिपि का सन्‍दर्भ मिलता है। इस लिपि के शिलालेख, पांडुलिपियां, ताम्रपत्र भी देखने में आते है।नन्दिनागरी ही एक ऐसी लिपि है जिसको देह पर गुदवाया जाता है। राम नामी की महत्ता भी इसी लिपि के कारण है।
(चित्र : नंदिनागरी लिपि में देह पर गुदाई और राम नामी ओढ़े महिला-पुरुष)

देवीपुराण में कहा गया है कि नन्दिनागरी लिपि बहुत सुन्‍दर है और इसका व्‍यवहार समस्‍त वर्णों को ध्‍यान में रखकर किया जाना चाहिए। इसमें किसी भी वर्ण और उसके अंश को भी तोड़ना नहीं चाहिए। अक्षरों को हल्‍का भी नहीं लिखना चाहिए न ही कठोर लिखना चाहिए।

हेमाद्रि (1260 ई.) ने भी इन श्‍लोकों को चतुर्वर्ग्‍ग चिन्‍तामणि में उद्धृत किया है-
नाभि सन्‍तति विच्छिन्‍नं न च श्‍लक्ष्‍णैर्न कर्कशै:।। 
नन्दिनागरकैव्‍वर्णै लेखयेच्छिव पुस्‍तकम्।। 
प्रारभ्‍य पंच वै श्‍लोकान् पुन: शान्तिन्‍तु कारयेत्। (देवीपुराण 91, 53-54 एवं शिवधर्मोत्‍तर)

पुस्‍तकों के लिखने के सन्‍दर्भ में यही मत अग्निपुराणकार ने भी प्रस्‍तुत किया है। नन्दिपुराण में कहा गया है कि स्‍याही का उचित प्रयोग करना चाहिए और वर्णों के बाहरी-भीतरी स्‍वरूपों को सही-सही प्रयोग करना चाहिए। उनको सुबद्ध करना चाहिए, रम्‍य लिखना चाहिए, विस्‍तीर्ण और संकीर्णता पर पूरा ध्‍यान देना चाहिए। (दानखण्‍ड अध्‍याय 7, पृष्‍ठ 549)
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