Salumbar Blog डॉ. श्रीकृष्ण "जुगनू"
आश्विन के महीने में भित्तिचित्र बनाने की परिपाटी बहुत पुरानी है। उस काल की जबकि मानव ने बारिश में धूली हुई पहाड़ी पत्थर वाली भित्तियों को उघाडी देखा और चींटी, कर्मला - कामला, गजाई, घेंगा आदि रेंगने वाले जंतुओं से बचाव के लिए गाय के गोबर का प्रयोग करना सीखा। बाद में, गोबर के उभरांकन सुगम रूप से करने के लिए आधार पर हिरमिच से रेखांकन किया। शैलाश्रय में भी ऐसे अंकन मिल जाते हैं। हिरमिच और खड़िया के नाम हड़मची और खड़मची क्या ऐसे ही हो गए!
गृहिणियां और महिलाएं, खासकर लड़कियां इस काम में आगे आईं। गुहाओं में गोबर से सज्जा का यह काम काम संजा या संझ्या भी कहा जाने लगा। संझ्या को सांझ से जुड़ा कन्या पर्व कहा जाता है, यह क्वार के कनागत का पक्ष पर्व भी है। सांझी, संझ्या, संध्या, क्वार चितराम, मामुलिया, भितां, रनु, रली, झांजी ... कई नाम मगर एक ही पर्व।
यह विश्वास भी पनप गया कि यह श्राद्धपक्ष में लोकदेवी संझ्या के स्मरण का सुअवसर है। लेकिन, इसमें पूर्ववर्ती पीढ़ियों के पात्रों, जो कि पूर्वज - पितर हैं, को उपकरणों, गतिविधियों समेत चित्रित करने का काम तो किया ही जाता है। गुहा चित्रों की पृष्ठभूमि इस प्रसंग में तुलनीय है। पानी पर रंग, आंगन में पत्तों से अंकन बहुत बाद में आया। उत्तर मध्यकाल में तो सांझी पर पदों की रचना भी होने लगी।
हमें पता है कि कन्याएं तिथि के अनुसार गाय के गोबर से नित नई आकृतियां बनाकर पत्तों, फूल-केसर, पंखुडियों से उसे सजाती हैं और फिर आरती करती हैं। 'आरती' यानी अपनी ही बनाई गई कला को कोई बुरी नजर न लग जाए, इसलिए निराकरण का उपाय। आरात्रिक या आरार्तिक... आरती का मूल विचार इस पर्व के साथ जुड़ा है। गो गोबर, गोलमण्डल, गुलपोशी, गोधूली वेला, गीतों से गुणगान... और पूरे पन्द्रह दिन बाद विसर्जन...। गुहा से गमन।
वेद में उषादेवी और रात्रि देवी के आवाहन का संदर्भ है मगर संध्यादेवी के पूजन का यह अनूठा पर्व है, जो प्रत्येक तिथि के साथ जुड़ी है और तिथि के वृद्धिसूचक अंकों के अनुसार अपना आकार तय करती जाती है... नारदपुराण में इन्हीं गुणों के कारण संध्यावली को श्रेष्ठ नायिका कहा गया है जो पति, पुत्र सहित महालय में लीन होती है लेकिन इसका खास सन्दर्भ सांब पुराण और ब्रह्माण्ड पुराण धारण किए हुए हैं लेकिन यह बड़ा सच है कि लोक से ही पुराणकारों ने ज्यादातर उधार लिया है। लोक का श्लोक किया है। हमें लोक के संदर्भ लोक में ही खोजने चाहिए। देखिए :
आला फूलां भरियो वाटको जी कांई,
संझ्या की बाई ओ,
संझ्या ने भेजो करां संझ्या री आरती...।
कानवन गांव के श्री नंदकिशोर प्रजापति और उनके साथियों ने संजा गीत संग्रह तैयार कर बंटवाया है। उज्जैन की डॉ. ज्योति बाला बैस और बेटी ने इस चित्र पर्व के चित्रों को जुटाया है और कहा है कि जितने दिन उससे ज्यादा त्योहार हम मना लेते है। उत्सव प्रिय जो ठहरे। जब उत्सवों को धर्म से सम्बद्ध किया तो ये आस्था में रच बस गए और पूज्य हो गए।
संजा लोकदेवी है और भादौ की पूर्णिमा को अपने मायके पधारती हैं। सखियों के संग खूब चुहलबाजी करती हैं। नन्ही बालिकाओं द्वारा दीवार पर गोबर से अनेक मंगल आकृतियां निर्मित की जाती हैं और सांझ ढले अर्चना होती है। दीप प्रज्वलित कर आरती की जाती है और कोमल कंठों से निकली स्वर लहरी सांझ वेला को रसमयी बना देती है। एक सांझी गीत :
काजल टीकी लो भई काजल टीकी लो,
काजळ टीकी लई ने म्हारी संजा बई के दो,
संजा बई को सासरो सांगानेर,
परण पधारिया गढ़ अजमेर...।
खूब सारे छोटे-छोटे गीत जो लगभग बाल कविता जैसे हैं, गाये जाते है, सबसे प्रमुख अंग है प्रसाद वितरण ,जो खट्टा, मीठा, तीखा कैसा भी हो, आसानी से वितरित नहीं होता है। परीक्षा है ये नाक के घ्राण शक्ति की, कानो की आवाज से पहचानने की,आँखों की छिपाकर रखी चीज को जानने की कि आखिर है क्या ? बताने में असफल रहने पर भी प्रसाद तो मिलता ही है। भुट्टे के दाने, अमरूद, सेवफल से लेकर चना चिरौंजी तक और फिर अगली लड़की के घर जाकर यही क्रम दोहराया जाता है, जब तक सबके घर पूजन न हो जाय।
हमने भी मनाया इस पर्व को खूब उल्लास के संग। एक गुट होता था सहेलियों का जो पहले गोबर फिर फूल पत्तियों की जुगाड़ करता। भाई भी मदद करते। पान की दुकान से सिगरेट की पन्नी कबाड़ लाते संजा की सज्जा के लिए। कोई कचहरी के बाहर रद्दी कार्बन और बटरपेपर बीन लाता। घर के हल्दी, कुमकुम, चावल और हो जाती संजा तैयार। डॉ. ज्योति लिखती हैं कि बालिकाओं द्वारा गोबर से दीवाल पर प्रतिदिन भिन्न भिन्न मंगल आकृतियों का निर्माण कर इस उत्सव को मनाया जाता है। सांझी को रिझाया जाता है।
..... सलूम्बर ब्लॉग ....
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