✍️ बिहारीलाल पुरोहित
गणेश चतुर्थी का अगला दिन यानी भादौ मास की शुक्ल पंचमी, इसे ऋषि पंचमी के रूप में मनाया जाता है। मेवाड़ अंचल में यह दिन 'हामा पाचम' के रूप में भी माना और जाना गया है। सांवा, सामा या हामा वनस्पति की पूजन परम्परा और इससे निपजे धान्य के सेवन के महत्व से यह नाम व्यवहार में आया।
भारतीय स्त्रियों के लिए व्रत, पूजन, कथा श्रवण से लेकर संयमित खाद्य सेवन से यह तिथि महत्वपूर्ण मानी गई है। पुराविद डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू बताते है कि इस पंचमी का पौराणिक महत्व है। इस दिन व्रतार्थी महिलाएं अपने घर के आसपास खड़ी वनस्पति को खोजने जाती थी। वापसी में सांवा, मलीचि, अपामार्ग, दूर्वा आदि उखाड़कर ले आती।
बिना हांके, बोए स्वतः उगने वाली विशिष्ट वनस्पति को व्रतार्थी घर पर पीले परिधान या धागों में लपेटती हैं और विधान पूर्वक कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वसिष्ठ सप्त ऋषि का पूजन, स्मरण किया जाता है। इनमें से अधिकांश ऋषियों का सम्बन्ध प्राचीन कृषि ज्ञान-विज्ञान से रहा है।
मानव सभ्यता में सांवा धान्य प्रारंभिक खाद्य औषधि के रूप में माना गया। पौराणिक कथा में एक ब्राह्मण रजस्वला स्त्री व उसके पति को ऋषियों का श्राप मिलने के उल्लेख आते है। ऋषियो के शाप से मुक्ति, रजस्वला काल मे हुई भूल चूक के प्रायश्चित, मासिक धर्म संबंधी रोग, दोष निवारण के प्रसंग भी है।
वैसे व्रतार्थी को इस दिन सिर्फ सांवा अथवा बगैर कटे फल सेवन करने के उपदेश मिलते है। सांवा को दही के साथ अलुणा और दूध के साथ फीका ही सेवन करने की परंपरा रही है। मगर आजकल इसकी हल्की मसालेदार खिचड़ी, मिठी खीर खाई जाने लगी है। अगले दिन 7 साधुओं या 7 ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथ व्रत का पारणा किया जाता है।
(चित्र : सांवा की हरी पौध और इससे निपजे धान्य की बिक्री) Salumbar Blog
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