ज्ञान प्रकाश सोनी. उदयपुर
भारत के संविधान का अनुच्छेद ३५१ यह निर्देश देता है कि संघ (सरकार) का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रचार प्रसार करे और पर्यायवाची शब्दों के लिये मुख्यतः संस्कृत व अन्य भारतीय भाषाओं का सहारा ले।
इस कर्तव्य की पूर्ति के लिये सन् १९६० में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना की गई लेकिन बीते साठ सालों में यह कर्तव्य निभाने में जितनी निष्ठा होनी चाहिए थी वह नहीं रही है।
इस कोविड काल को ही लें तो “सोशल डिस्टैंस”, “आइसोलेशन”, “क्वारैंटाइन”, “वैक्सीन” जैसे कई अंग्रेज़ी शब्दों को बढ़ावा दिया गया है।
जबकि संस्कृत आधारित हिंदी पर्याय आसानी से अपनाए जा सकते थे। सरकार ने अपने ही संस्थान, केन्द्रीय हिंदी निदेशालय की सहायता इस बारे में नहीं ली है।
यदि सामाजिक दूरी, एकांतवास, एकांतित, टीका, टीकाकरण, आदि शब्द अपनाए जाते तो हिंदी के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रचलित हो जाते।
चाहे संविधान हो, चाहे क़ानून, हम प्रावधान तो बहुत आदर्श रूप से करते हैं पर इनकी पालना में निष्ठा बहुत कम। इस परिपाटी को बदलना समय की आवश्यकता है।
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