Sunday, 9 October 2022

शरद पूर्णिमा के लिए पौराणिक भारतीय आयुर्वेद का विशेष योग

Salumbar Blogक सूखे नारियल (खोपरा, गोटा, गोला) को बीच में से काटकर दो टुकड़े करें. एक कांसी की थाली लें. अब एक खोपरे के टुकड़े में जितनी मात्रा में आ सके उतनी साबुत काली मिर्च भरकर उसे कांसी की थाली में खाली कर लें.

अब उसी खोपरे के टुकड़े में जितनी मात्रा में आ सके उतना खांड का बूरा या डोरा मिश्री के टुकड़े भरकर उसी कांसी की थाली में कालीमिर्च के साथ मिला लें. अब उसी खोपरे के टुकड़े में शुद्ध देशी घी भर लें. उसे भी कालीमिर्च बूरा में डालकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें.

अंत में नारियल के दूसरे आधे टुकड़े में देशी घी भरकर कांसी की थाली वाले मिश्रण पर रख दें. अब इस थाली को शरद पूर्णिमा की संध्या से रातभर चंद्रमा की पावन रोशनी में रखें. सुबह प्लेट की सारी सामग्री (कालीमिर्च, बूरा, घी व आधा खोपरे का टुकड़ा) को मिक्सर में पीस लें.

केवल घी से भरा रातभर रखा हुआ खोपरे का एक टुकड़ा ही पीसना है. दूसरे टुकड़े को आप किसी अन्य काम में उपयोग कर सकते हैं और पिसे हुए मिश्रण को एक काँच के ढक्कनदार बर्तन में निकाल लें.

इस दिव्य अमृतमय योग को किसी भी उम्र के व्यक्ति को एक चम्मच सुबह-सुबह चबाकर उपर से गर्म दूध पी लेने की सलाह दी जाती है.

इस योग का सेवन करने वाले की आँखे स्वस्थ रहती है, रोशनी में बढ़ोतरी होती है और मस्तिष्क में बुद्धिबल मिलता है.

याद रहे कि थाली कांसी धातु की ही लेनी चाहिए क्योंकि चंद्रमा की किरणों का प्रभाव हर धातु पर अलग अलग पड़ता है. कांसी के अभाव में चांदी की थाली उपयुक्त रहती है.

🙏साभार : श्री एसबी मुथा🙏

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Wednesday, 7 September 2022

बैरका : आदिवासी परंपरा का अनूठा रक्षासूत्र

बैरका : आदिवासी परंपरा का अनूठा रक्षा-सूत्र

Salumbar Blog | सलूम्बर ब्लॉग

बहनों से बड़ा परिवार का सुरक्षा कवच कौन होगा! वे भाई के लिए चिरायुष्य चाहती हैं। भाभी के लिए चूड़ा, चूनर का भाग्य चाहती हैं। भाई से वे बहन हैं और बहन हैं तो भाई भाई हैं।


भादौ माह में भाई के लिए बहन का यह भाव निर्मल होकर बहता है या स्वच्छ सरोवर में हिलोर लेता है। इसलिए कि भाई ने बहन कुंवायों के निरोग, निरामय रहने के लिए गवरी का व्रत लिया है।

बस्ती के हर पथ पर थिरक कर उसने महामारी को दूर किया और समृद्धि का आह्वान किया है। रायों ने गायों को कामधेनु किया है! लज्जा और धज्जा गौरज्या को लेकर भाई पीहर और ससुराल के घर घर खुशी बांट रहा है।

लोक परम्पराविद डॉ. श्री कृष्ण जुगनू बताते है कि भादौ की ग्यारस (डोल एकादशी, जल झिलनी एकादशी) को बहनें वारी जाती हैं। फूली नहीं समातीं! वह मांजाये भाई के लिए नारियल की चटकों की माला लेकर पहुंचती है और अपने हाथों उसकी भुजा पर बांधती है!

यह माला " बैरका " कही जाती है। भाई की दोनों भुजा पर बहनों द्वारा बांधा यह बैरका रक्षाबंधन से कम नहीं। भाइयों की भुजाएं शोभित होती हैं। वे इस दिन स्नान कर नारियल की इन चटकाें का ही फलाहार करते हैं।


#आदिवासीपरंपरा #tribalrituals #gavari #गवरी #मेवाड़भील #bheel #बैरका #bairka

Sunday, 5 June 2022

आलवाल : पेड़ का सुरक्षा चक्र

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लोक जीवन में आदरणीय वृक्षों की सुरक्षा के लिए जो उपाय किए जाते हैं, उनमें थाला बनाना मुख्य है। थाला यानी आलवाल! संस्कृत में आलवाल शब्द ही मिलता है और वृक्षायुर्वेद, उपवन विनोद, वृक्षोत्सर्गविधि, वाटिका विधि, द्रुमरंजन, विश्ववल्लभ, वृक्षायुज्ञान, जैसे अनेक ग्रन्थों में आलवाल के संदर्भ आए हैं।

आज पेड़ बहुत लगते हैं लेकिन थाले कितने पेड़ों के बनते हैं? थाले पेड़ों के आश्रय, भुजबल जैसे होते हैं। आलवाल बनाकर वृक्षों की सुरक्षा करने, आलवाल में ही पानी, खाद और पोषक कुणप जल ( विशिष्ट तरल खाद), कीट आदि लगने पर वायविडंग आदि देने के निर्देश अनेकत्र मिलते हैं। थाला एक प्रकार से वृक्ष के आहार करने की थाली है। यह वृक्ष भोजन पात्र है। यहां दिए जल आदि के आधार पर वृक्ष की व्याधि का अनुमान लगाया जाता : 
आलवाले स्थितं तोयं शोषं न भजते यदा।
अजीर्णं तद्विजानीयान्नदेयं तादृशे जलम।। (वृक्षायुर्वेद ४, ४ और श्रीकृष्ण "जुगनू", भूमिका)

बौद्ध और उत्तर कालीन जो शिल्प मिले हैं, उनमें पीपल आदि के थाले, सुंदर आलवाल बने दिखाई देते हैं। थाला त्रिकोण, वृत्त, चौकोर, पंचकोण आदि आकारों में बनते हैं। तुलसी आदि के लिए क्यारे स्तंभाकार बनाए जाते हैं। कई बार ऐसे आलावाल वाले पेड़ों के पास चबूतरे का विकास कर दिया जाता है और खेल, बातचीत आदि की गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। यह चौरा, चबूतरा, चौतरा भी कहा जाता है और चत्वर भी...।

(आलेख साभार : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू')

Friday, 15 April 2022

सतुआनी : चैत का स्वाद

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चेत मास आते-आते नवीन चना, जौ की कटाई पूरी हो चुकी है। सूर्य के अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश के साथ शुभ कार्य आरंभ हो रहे हैं।

संक्रांति है ना! हम संक्रांति के बिस्वासी हैं। बरस में बारह बार संक्रांति होती है। ग्रहों की होती है तो गृहों में भी, गणना में होती है तो आहार में भी।

नव वर्ष की मान्यता है। इसको पूर्व और दक्षिण तक पर्व के रूप में मनाया जाता है। ऐसे में सतुआनी का सेवन होता है।

यूं इस चना, जौ के सत्तू का बड़ा महत्व है। सत्तू गर्मी से बचाता है। किसान का मुख्य खाना है। इसके बाद वे पानी पीकर अपना काम करते रहते हैं।

इस आहार के साथ ही आम पुदीना की चटनी होती है। यही नहीं, अचार, यथा रुचि प्याज, हरी मिर्च और कच्चा आम थाली को सजा ही नहीं देते, जीभ को मजा भी देते हैं।

✍️ डॉ. श्रीकृष्ण जुगनू

#सतुआनी #सत्तू

Tuesday, 1 March 2022

महाशिवरात्रि विशेष : शिव और उनके शास्‍त्र

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भगवान शिव की महिमा अपरम्पार है। स्‍वयं ताे आशु आराधना से संतुष्‍ट हो जाने वाले आशुतोष, मगर उनके स्‍वरूप और साधना के संबंध में इतना लिखा गया है कि पढ़ने, समझने में और आचरण में लाने में कई जन्‍म पूरे हो जाएं। शैवागमों की शृंखला ही बहुत विस्‍तृत है। वैरोचन के 'लक्षणसार समुच्‍चय' में बावन आगमों के विशाल वांगमय पर विस्‍तार से विमर्श हुआ है। 

पुराविद डॉ. श्रीकृष्ण "जुगनू" बताते है कि
"कामिकागम", सुप्रभेदागम, अजितागाम, दीप्तागम के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध शिवालय की रचना और अर्चना के विधान का आगार है।  यही वजह है कि कामिकागम के पूर्वार्द्ध को बहुत उपयोगी मानकर हिंदी अनुवाद किया जा रहा है।

भगवान् शिव के शास्‍त्र के रूप में 'शिवधर्म' और 'शिवधर्मोत्‍तर' ग्रंथों को रचा गया। दोनों में से पहले ग्रंथ में ब्राह्मीलिपि का जिक्र है जबकि दूसरे में नंदिनागरी लिपि का। इसी कारण से लगता है कि पहला ग्रंथ गुप्‍तकाल के आसपास लिखा गया जबकि दूसरा वातापी के चालुक्‍य के शासनकाल का होना चाहिए। ये वे ग्रंथ माने जा सकते हैं जो क‍ि लिंगपुराण, शिवपुराण, नंदिपुराण, सौरपुराण आदि के आधारभूत रहे हैं।

नन्दीकेश्वर पुराण और शंकर पुराण का उल्लेख हेमाद्रि ने किया है। शिवभागवत भी रहा। उक्त दोनों ग्रंथों के ही पहली बार संपादन-अनुवाद के दौरान मुझे लगा कि जटिल परंपराओं के विपरीत धर्म को आचरणमूलक अंग बनाने का प्रयास होना चाहिए। 

जीवन में सब पर करुणा, दया और सहयोग हो और स्‍वाध्‍याय को सर्वोच्‍च प्राथमिकता मिले और सरलतम रूप में शिव की आराधना हो। आतंक, द्वेषमूलक कुकर्मों से मुक्‍त होकर शिवानंद का अनुभव किया जा सकता है। शिव कल्‍याणकारी है, उनका यह भाव जीवन का ध्‍येय होना चाहिए।

इनमें शिवरात्रि का विधान नहीं आया किंतु लिंगपुराण, शिवपुराण, स्‍कंदपुराण और गरुड़पुराण में इस व्रत का विधान विशेषरूप से आता है। आबू के एक आदिम-आख्‍यान को इस व्रत का उत्‍स माना गया है। आज यह आख्‍यान इतना लोकप्रिय है कि इस कथा को सुने बिना इस पर्व का विधान पूरा नहीं होता।

न केवल भारत बल्कि मारीशस तक यही कथा लोकप्रिय है... लोक में शिव की यह व्याप्ति उनको लोकेश कहती है, जो लोक में कुछ प्राप्त है, वह लोकेश्वर का अनुग्रह... शिव सदैव कल्‍याणकारी रहें.
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#शिवरात्रि #शिवशास्त्र #सलूम्बरब्लॉग
#shivashastra

Saturday, 5 February 2022

बसन्त पंचमी पर रसाल मंजरी का महत्व

✍️ बिहारीलाल पुरोहित | 
आम्र वृक्षों पर फूल आने के साथ ही ऋतुराज वसन्त का आगमन होता है। मेवाड़-वागड़ अंचल में आम के पेड़ों को 'आम्बा' व इसके फूलों को मौड़, मोड़ या मोर भी कहा जाता है। खेतों व बागों में उगे आम के पेड़ों पर खिली हरे-पीले रंगों से मिश्रित मंझरियाँ दूर से ही मानव मात्र को मुग्ध कर देती है। वहीं इनका सामीप्य भीनी-भीनी खट्टी खुशबू से तन-मन को सराबोर कर देता है।

(चित्र- फूलों से लकदक आम्र वृृक्ष)

रसाल मंझरियाँ यानी आम के फूल धार्मिक महत्व और मान्यता से भी जुड़े हुए है। यह 'मांजर' मोहकता व मादकता के प्रतीक भगवान कामदेव से ताल्लुक रखती है। ये भगवान के शृंगार में शुमार होती है। मंदिरों में बसन्त पंचमी को मोड़ मनोरथ की परंपरा है। श्रद्धालु इन मंझरियों के माध्यम से भगवान के श्रीविग्रह पर गुलाल उड़ाते हुए मंगलगान करते है।

(चित्र : महादेव का मोड़ मनोरथ)

यह मोड़ सामाजिक साम्यता व सन्देश भी संग लाते है। मल मास बीतने के बाद सावों सहित अन्य सामाजिक, धार्मिक आयोजन भी शुरू हो जाते है। लगभग इसी वक्त आम के मोड़ खिलते है। जो दूल्हा, दुल्हन के सिर पर भी मोड़ बांधने के मौसम का संदेश देते है। फूलों की फुटन होते ही आम के पेड़ खास हो जाते है और उससे भी खास इन पेड़ों के मालिक। ग्रामीण क्षेत्रों में इन पेड़ के स्वामी समृद्धशाली माने जाते है। 
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सलूम्बर ब्लॉग | Salumbar Blog
#रसालमंजरी #मौड़मनोरथ #वसन्तपंचमी #आमकेफूल

Sunday, 28 November 2021

शुक्लगिरी महाराज का षोडशी भण्डारा आयोजित

✍️ सलूम्बर ब्लॉग | Salumbar Blog |
28.11.21 | उदयपुर रोड स्थित वैद्यनाथ धूणी के दिवंगत महंत शुक्लगिरी महाराज का दो दिवसीय षोडशी भण्डारा कार्यक्रम रविवार को धूमधाम से सम्पन्न हुआ। इस दौरान हुए सन्त समागम में मेवाड़ वागड़ के विभिन्न मठ मंदिरों के दर्जनों साधु-महात्मा शामिल हुए।
दो दिवसीय कार्यक्रम के तहत शनिवार सवेरे से धूणी पर संतों का आगमन शुरू हो गया। संध्या आरती के बाद महंत घनश्याम गिरी के सानिध्य में रात्रि जागरण, भजन कार्यक्रम हुआ। मेवल के प्रसिद्ध लोक भजन गायक शंकरपुरी सहित अन्य श्रद्धालुओं ने भी भक्ति धुनों पर प्रस्तुतियां दी।

रविवार दोपहर संगेसरा मठ के महंत रामचन्द्र गिरी महाराज के सान्निध्य में शुक्लगिरी महाराज की समाधि पर पूजन कर भोग धराया गया। इसके बाद सोलह साधुओं को इतनी ही वस्तुओं का दान कर भोजन कराया गया।

श्रद्धालुओं ने महंत घनश्याम गिरी, रविकांत महाराज का माल्यापर्ण कर आशीर्वाद लिया। इस दौरान पांडाल गुरुदेव के जयकारों से गूंजता रहा। शिवानंद गिरी, ओम पुरी, अनिरूद्ध गिरी महाराज सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

Thursday, 25 November 2021

अब पाकिस्तानी भी खोज रहे हैं काफिरों में अपने पुरखे

Salumbar Blog |

पाकिस्तान का जब निर्माण हुआ तो पाकिस्तान के इतिहास से इस्लाम के पूर्व के इतिहास का पूर्णतः सफाया कर दिया गया। पाकिस्तान के काॅलेजों और स्कूलों में जो इतिहास पढ़ाया जाता था उसकी शुरूआत ही मोहम्मद बिन कासिम के हमले से होती थी। मगर अब पाकिस्तान के बुद्धिजीवी अपने इतिहास और पुरखों को इस्लाम के पूर्व के युग में तलाशने में जुट गए हैं। अब उन्हें आचार्य चाणक्य, सम्राट पोरू और राजा दाहर में अपने पूर्वज नजर आने लगे हैं। पाकिस्तान के पांच विश्वविद्यालय के इतिहास विभागों ने इस्लाम से पूर्व इतिहास और संस्कृति के अनुसंधान के लिए 24 परियोजनाएं शुरू की हैं।

पाकिस्तान के विख्यात् बुद्धिजीवी शैफ ताहिर ने इस बात पर शोक व्यक्त किया है कि पाकिस्तान के पुरखों में आचार्य चाणक्य का नाम क्यों शामिल नहीं है। उन्होंने कहा है कि धर्म और मजहब के आधार पर इतिहास का विभाजन किसी भी राष्ट्र और नस्ल के लिए बेहद खतरनाक है। उन्होंने कहा कि हम पाकिस्तानी होते हुए तक्षशिला विश्वविद्यालय और आचार्य चाणक्य की महानता से मुंह नहीं मोड़ सकते। वह हमारे इतिहास और सभ्यता का एक अंग हैं। उन्होंने दावा किया कि आचार्य चाणक्य का जन्म हरीपुर हजारा के एक गांव मोरढूह में हुआ था।

इससे पूर्व पाकिस्तान की एक अन्य बुद्धिजीवी फौजिया सईद ने पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर यह दावा करके सनसनी पैदा कर दी थी कि पाकिस्तान की अधिकांश जनसंख्या के पूर्वज हिन्दू थे और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया था। पाकिस्तान के एक अन्य इतिहासकार शाहिद शब्बीर ने एक विशेष कार्यक्रम प्रसारित किया है। जिसमें कहा है कि महाराजा पोरू पाकिस्तानियों के पूर्वज थे और उनकी राजधानी  रावलपिंडी के कुरी के स्थान पर थी। उन्होंने प्राचीन दुर्ग के अवशेषों को अपने कार्यक्रम में प्रस्तुत किए हैं।

हाल मे लाहौर मे पाकिस्तानी संस्था "जीवे पंजाब" ने पुरू दिवस मनाया।  एक दर्जन से अधिक पंजाबी बुद्धि जीवियो ने कहा पंजाब के भूमि पुत्र ही हमारे असली हीरो है। पंजाब पर हमला करने वाला कोई भी हमलावर हमारा हीरो नही हो सकता। इस बैठक मे एक प्रस्ताव पारित करके पाकिस्तान से मांग की गई कि झेलम मे महाराज पुरू की मूर्ति स्थापित की जाए।

सिंध विश्वविद्यालय के एक ऐतिहासिक अन्वेषक लतीफ लुगारी ने एक अनुसंधान पत्र हैदराबाद सिंध विश्वविद्यालय की गोष्ठी में प्रस्तुत किया जिसमें सिंध के अंतिम हिन्दू सम्राट राजा दाहिर के शौर्य की शानदार शब्दों में प्रशंसा की गई है। उन्होंने अपने भाषण में सिंध प्रदेश में राजा दाहिर की पुरानी राजधानी के भग्नावेषों का वीडियो भी पेश किया है। उन्होंने कहा कि एक सिंधी होने के नाते उन्हें राजा दाहिर पर गर्व है।

हाल में ही पेशावर विश्वविद्यालय में इस्लाम से पूर्व के पाकिस्तानी इतिहास पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें दस अनुसंधान पत्र ब्राह्मणशाही के राजाओं के बारे में पेश किए गए। इस गोष्ठी में एक विद्वान मोहम्मद सईद ने हुंजा के काफिर कबीले पर एक अनुसंधान पत्र पेश करते हुए दावा किया कि यह कबीला विशुद्ध आर्यन रक्त का है और आज भी इसमें जो भाषा बोली जाती है वो प्राचीन संस्कृत का ही एक रूप है।

आलेख साभार : श्री मनमोहन शर्मा (वयोवृद्ध पत्रकार)

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Wednesday, 10 November 2021

छठ पूजा : आस्था के साथ वनस्पति का सम्मान

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न कार्तिक समो मास... सचमुच कार्तिक मास पूरा ही प्रकृति में वनस्पति, औषध, कृषि और उसके उत्पाद के ज्ञान की धारा लिए है। अन्नकूट के मूल में जो धारणा रही, वह इस ऋतु में उत्पादित धान्य और शाक के सेवन आरंभ करने की भी है। अन्न बलि दिए बिना खाया नहीं जाता, इसी में भूतबलि से लेकर देव बलि तक जुड़े और फिर गोवर्धन पूजा का दिन देवालय - देवालय अन्नकूट हो गया।

छठ पर्व इस प्रसंग में विशिष्ट है कि कुछ फल इसी दिन दिखते है। डलिए, छाब और छाभ भर भरकर फल निवेदित किए जाते हैं, सूर्य को निवेदित करने के पीछे वही भाव है जो कभी मिस्र, ग्रीक और यूनान तक रहा। सबसे प्रभावी ज्योतिर्मय देव को उत्पाद का अंश दान। छठ तिथि का ध्यान ही फलमय हुआ क्योंकि छह की संख्या छह रस की मानक है। भोजन, स्वाद और रस सब षट् रस हैं। इस समय जो भी फल होते हैं, वो बिना चढ़ाए महिलाएं खाती नहीं है। 

विद्वान श्री अत्रि विक्रमार्क एक अलग बात भी कहते हैं षष्ठी (मातृका और कार्तिक मास) के बारे में। भाद्रपद शुक्ला षष्ठी हल-षष्ठी नाम से मनती है, यह तिथि बलराम के जन्मदिन से संयुक्त भी मानी गई है, इस दिन महिलायें हल से उत्पन्न अन्न नहीं खाती हैं। इसके 60 दिनों बाद मनाई जाने वाली डाला-छठ भी ऐसा व्रत है जिसमें निराहार रहती हैं। उपज का षष्ठांश राजा ले जाता था, हल षष्ठी एवं डाला छठ 60 दिनों में उत्पन्न होने वाली धान की सस्य से जुड़ा हुआ लगता है, एवं षष्ठांश प्रकृति राजा को दिया जाने वाला कर।

चातुर्मास के व्रतों में प्राजापत्यादि व्रत में अन्तिम ३ दिन निराहार रहकर व्रत का निर्देश पुराणों में प्राप्त है। डालाछठ में भी 3 दिनों का व्रत उन्हीं व्रतों का संक्षिप्त रूप ही है। इस टिप्पणी के प्रत्युत्तर में नेपाल देश निवासी श्री उद्धब भट्टराई अपनी स्मृति लिखते हैं कि -
"जी बिल्कुल सत्य तथ्य आधारित है। मुझे याद है पहले हमारे यहां साठी प्रजाति के धान की चावल से ही आज की शाम भोग में प्रयोग होनेवाली रसीआव रोटी वाली गुड़ प्रयुक्त खीर और उसी साठ़ी चावल के आटे से ही "डाला छठ" पूजा के लिये शुद्ध देशी घी में ठेकूवा प्रसाद तैयार किया जाता रहा।"

और, बांस के डलिए भरे फलों में शाक सहित रसदार फल भी होते हैं : केला, अनार, संतरा, नाशपाती, नारियल, टाभा, शकरकंदी, अदरक, हल्दी और काला धान जिसे साठी कहते हैं और जिसका चावल लाल होता है, अक्षत के रूप में प्रयोग होता है। श्रीफल, सिंघाड़ा, नींबू, मूली, पानी फल अन्नानास... सबके सब ऋतु उत्पाद। 

ईख का तोरण द्वार और बांस की टोकरी... यह सब वंश पूर्वक अर्चना है। फिर, चवर्णक और मसालों में गिनिए : पान, सुपारी, लोंग, इलायची, सूखा मेवा... है न रोचक तथ्य और सत्य। प्रकृति ने जो कुछ हमें दिया, उसका अंश हम उत्पादक शक्तियों को निवेदित करके ही ग्रहण करें। यह भाव भारतीयों का अनुपम विचार है जिसका समर्थन गीता भी करती है। 

छठ मैया के लोकगीतों का अपना गौरव और गणित है लेकिन गीत अगणित हैं। उनमें सूर्य नमस्कार के रूप में सुंदर भाव है। सूर्य के बल रूप में जोड़, ताप शमन के रूप में बाकी, अपेक्षा के रूप में गुणा और अनुग्रह के रूप में भाग का भाव मिलता है :
छठी मैया के रोपल जीरवा
जीरवा लहसत जाय,
जीरवा लहसत जाय।
जीरा के रखवार सूरजमल
जीरा लहले सिहोर, 
जीरा लहले सिहोर...।

और भी गीत गाये जाते है जिनमें गंगा है, गंगा की लहरें, पवित्र जलधारा, हिलोर, नैया, नाविक आदि भी हैं, जैसे : 
गंगाजी बहेली झराझर 
नइयां आवै बहुत, नइयां आवै बहुत।
कलसुपवा भरल नइयां 
आवै बहुत नइयां आवै बहुत...।
(आलेख : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू')
सलूम्बर ब्लॉग

Sunday, 24 October 2021

सैनिकों ने रूटमार्च के साथ हाडी रानी को अर्पित की पुष्पांजलि

✍️ Salumbar Blog |

उदयपुर स्थित एकलिंगगढ़ सैन्य स्टेशन के स्वर्णिम विजय वर्ष समारोह के अन्तर्गत 'द मेवाड़ ट्रेल' एक पैदल आधारित अभियान यात्रा रविवार को सलूंबर पहुंची। मेवाड़ के पूर्व रियासत से जुड़ी भारतीय सेना के ग्रेनेडियर्स रेजिमेंट की 9वीं बटालियन की मेजबानी में चल रहे इस अभियान की सैन्य टुकड़ी का नगर के जन प्रतिनिधियों, राजनितिक दलों, सामाजिक संगठनों और आमजन ने पुष्प वर्षा के बिच आतिशी स्वागत किया।

(चित्र : हाड़ी रानी स्मारक पर पुष्पांजलि कार्यक्रम के दौरान सैनिक)

बटालियन के 70 जवानों का जत्था मेवल क्षेत्र से होकर दोपहर एक बजे सलूंबर के सुरजपोल पहुंचा। जहां से पैदल रूटमार्च करते हुए खटीक वाडा, गांधी चौक, होली चौक, पैलेस रोड़ होते हुए रावलीपोल पहुंचा। मार्ग में जगह-जगह रंगोलियां सजाई, स्वागत द्वार लगाए गये। जहाँ तिलक, माल्यार्पण, पुष्य वर्षा और आतिशबाजी की गई। युवाओं ने जमकर देशभक्ति से ओतप्रोत जयकारे लगाए।

(चित्र : तिरंगे झंंडे के साथ रावलीपोल में प्रवेश करती सैन्य टुकड़ी )

सैनिको ने रावलीपोल स्थित शहीद स्मारक, हाड़ी रानी स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित की। वही पेनोरमा प्रदर्शनी का अवलोकन किया और बाण माता मंदिर में दर्शन कर माथा टेका। इस दौरान दुवाओं के साथ ही महिलाओ और बच्चों में सशस्त्र सैनिकों के साथ फोटो खींचवाने की होड़ सी मची रही। एहतियात के तोर पर थानाधिकारी हनवंत सिंह सोढा पुलिस जाप्ते के साथ तैनात रहे।

(चित्र : बच्चों में सैैनिकों के साथ फोटो का उत्साह  )

आपको बता दे कि इस यात्रा अभियान का उद्देश्य मेवाड़ क्षेत्र के महापुरुषों, वीर-वीरांगनाओं, सैनिकों की वीरता, बलिदान और त्याग भावना को याद दिलाना है। यह यात्रा गत 8 अक्टूबर को उदयपुर से रवाना हुई थी जिसका समापन 27 अक्टूबर को वापस उदयपुर पहुँचने पर होगा। इन सैनिकों द्वारा हल्दी घाटी, चितौड़गढ, कुंभलगढ़ एवं दिवेर आदि होते हुए मेवाड़ के महत्वपूर्ण एतिहासिक स्थलों के भ्रमण के साथ 550 किलोमीटर की दूरी तय की जा रही है।


***** सलूम्बर ब्लॉग *****

Monday, 18 October 2021

सलूम्बर पालिकाध्यक्ष ने शिक्षामंत्री से की रिक्त पद भरने की मांग

Salumbar Blog |
सलूम्बर नगर पालिका के चैयरमेन प्रद्युम्न कोडिया ने सोमवार को शिक्षा राज्य मंत्री गोविंद डोटासरा को ज्ञापन सौप कर राउमावि में वर्षों से लंबित रिक्त पदों को भरने की मांग की।
कोडिया ने अपने ज्ञापन में बताया कि सलूम्बर मुख्यालय स्थित ब्लॉक के सर्वाधिक विद्यार्थी संख्या वाले राउमावि में कुल 49 पद स्वीकृत है। मगर इसमें 26 पद लंबे समय से रिक्त चल रहे है। ऐसे में इन्हें शिघ्रता से भरते हुए राहत दिलाने की मांग की।

साथ ही कोडिया ने टीएसपी बाहुल्य सलूम्बर मुख्यालय प पर अंग्रेज़ी माध्यम विद्यालय को मंजूरी देकर क्षेत्र के जरूरतमंद विद्यार्थियों को राहत दिलाने की मांग की। उल्लेखनीय है कि मंत्री डोटासरा धरियावद विधानसभा सीट उप चुनाव के तहत झल्लारा ब्लॉक के धोलागिर खेड़ा में सभा को संबोधित करने आये थे।

***** सलूम्बर ब्लॉग *****

शरद पूर्णिमा के लिए पौराणिक भारतीय आयुर्वेद का विशेष योग

S alumbar Blog |  ए क सूखे नारियल (खोपरा, गोटा, गोला) को बीच में से काटकर दो टुकड़े करें.  एक कांसी की थाली लें.  अब एक खोपरे के टुकड़े में ज...