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लोक जीवन में आदरणीय वृक्षों की सुरक्षा के लिए जो उपाय किए जाते हैं, उनमें थाला बनाना मुख्य है। थाला यानी आलवाल! संस्कृत में आलवाल शब्द ही मिलता है और वृक्षायुर्वेद, उपवन विनोद, वृक्षोत्सर्गविधि, वाटिका विधि, द्रुमरंजन, विश्ववल्लभ, वृक्षायुज्ञान, जैसे अनेक ग्रन्थों में आलवाल के संदर्भ आए हैं।
आज पेड़ बहुत लगते हैं लेकिन थाले कितने पेड़ों के बनते हैं? थाले पेड़ों के आश्रय, भुजबल जैसे होते हैं। आलवाल बनाकर वृक्षों की सुरक्षा करने, आलवाल में ही पानी, खाद और पोषक कुणप जल ( विशिष्ट तरल खाद), कीट आदि लगने पर वायविडंग आदि देने के निर्देश अनेकत्र मिलते हैं। थाला एक प्रकार से वृक्ष के आहार करने की थाली है। यह वृक्ष भोजन पात्र है। यहां दिए जल आदि के आधार पर वृक्ष की व्याधि का अनुमान लगाया जाता :
आलवाले स्थितं तोयं शोषं न भजते यदा।
अजीर्णं तद्विजानीयान्नदेयं तादृशे जलम।। (वृक्षायुर्वेद ४, ४ और श्रीकृष्ण "जुगनू", भूमिका)
बौद्ध और उत्तर कालीन जो शिल्प मिले हैं, उनमें पीपल आदि के थाले, सुंदर आलवाल बने दिखाई देते हैं। थाला त्रिकोण, वृत्त, चौकोर, पंचकोण आदि आकारों में बनते हैं। तुलसी आदि के लिए क्यारे स्तंभाकार बनाए जाते हैं। कई बार ऐसे आलावाल वाले पेड़ों के पास चबूतरे का विकास कर दिया जाता है और खेल, बातचीत आदि की गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। यह चौरा, चबूतरा, चौतरा भी कहा जाता है और चत्वर भी...।
(आलेख साभार : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू')
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