✍️ बिहारीलाल पुरोहित |
आम्र वृक्षों पर फूल आने के साथ ही ऋतुराज वसन्त का आगमन होता है। मेवाड़-वागड़ अंचल में आम के पेड़ों को 'आम्बा' व इसके फूलों को मौड़, मोड़ या मोर भी कहा जाता है। खेतों व बागों में उगे आम के पेड़ों पर खिली हरे-पीले रंगों से मिश्रित मंझरियाँ दूर से ही मानव मात्र को मुग्ध कर देती है। वहीं इनका सामीप्य भीनी-भीनी खट्टी खुशबू से तन-मन को सराबोर कर देता है।
रसाल मंझरियाँ यानी आम के फूल धार्मिक महत्व और मान्यता से भी जुड़े हुए है। यह 'मांजर' मोहकता व मादकता के प्रतीक भगवान कामदेव से ताल्लुक रखती है। ये भगवान के शृंगार में शुमार होती है। मंदिरों में बसन्त पंचमी को मोड़ मनोरथ की परंपरा है। श्रद्धालु इन मंझरियों के माध्यम से भगवान के श्रीविग्रह पर गुलाल उड़ाते हुए मंगलगान करते है।
(चित्र : महादेव का मोड़ मनोरथ)
यह मोड़ सामाजिक साम्यता व सन्देश भी संग लाते है। मल मास बीतने के बाद सावों सहित अन्य सामाजिक, धार्मिक आयोजन भी शुरू हो जाते है। लगभग इसी वक्त आम के मोड़ खिलते है। जो दूल्हा, दुल्हन के सिर पर भी मोड़ बांधने के मौसम का संदेश देते है। फूलों की फुटन होते ही आम के पेड़ खास हो जाते है और उससे भी खास इन पेड़ों के मालिक। ग्रामीण क्षेत्रों में इन पेड़ के स्वामी समृद्धशाली माने जाते है।
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