Salumbar Blog |
न कार्तिक समो मास... सचमुच कार्तिक मास पूरा ही प्रकृति में वनस्पति, औषध, कृषि और उसके उत्पाद के ज्ञान की धारा लिए है। अन्नकूट के मूल में जो धारणा रही, वह इस ऋतु में उत्पादित धान्य और शाक के सेवन आरंभ करने की भी है। अन्न बलि दिए बिना खाया नहीं जाता, इसी में भूतबलि से लेकर देव बलि तक जुड़े और फिर गोवर्धन पूजा का दिन देवालय - देवालय अन्नकूट हो गया।
छठ पर्व इस प्रसंग में विशिष्ट है कि कुछ फल इसी दिन दिखते है। डलिए, छाब और छाभ भर भरकर फल निवेदित किए जाते हैं, सूर्य को निवेदित करने के पीछे वही भाव है जो कभी मिस्र, ग्रीक और यूनान तक रहा। सबसे प्रभावी ज्योतिर्मय देव को उत्पाद का अंश दान। छठ तिथि का ध्यान ही फलमय हुआ क्योंकि छह की संख्या छह रस की मानक है। भोजन, स्वाद और रस सब षट् रस हैं। इस समय जो भी फल होते हैं, वो बिना चढ़ाए महिलाएं खाती नहीं है।
विद्वान श्री अत्रि विक्रमार्क एक अलग बात भी कहते हैं षष्ठी (मातृका और कार्तिक मास) के बारे में। भाद्रपद शुक्ला षष्ठी हल-षष्ठी नाम से मनती है, यह तिथि बलराम के जन्मदिन से संयुक्त भी मानी गई है, इस दिन महिलायें हल से उत्पन्न अन्न नहीं खाती हैं। इसके 60 दिनों बाद मनाई जाने वाली डाला-छठ भी ऐसा व्रत है जिसमें निराहार रहती हैं। उपज का षष्ठांश राजा ले जाता था, हल षष्ठी एवं डाला छठ 60 दिनों में उत्पन्न होने वाली धान की सस्य से जुड़ा हुआ लगता है, एवं षष्ठांश प्रकृति राजा को दिया जाने वाला कर।
चातुर्मास के व्रतों में प्राजापत्यादि व्रत में अन्तिम ३ दिन निराहार रहकर व्रत का निर्देश पुराणों में प्राप्त है। डालाछठ में भी 3 दिनों का व्रत उन्हीं व्रतों का संक्षिप्त रूप ही है। इस टिप्पणी के प्रत्युत्तर में नेपाल देश निवासी श्री उद्धब भट्टराई अपनी स्मृति लिखते हैं कि -
"जी बिल्कुल सत्य तथ्य आधारित है। मुझे याद है पहले हमारे यहां साठी प्रजाति के धान की चावल से ही आज की शाम भोग में प्रयोग होनेवाली रसीआव रोटी वाली गुड़ प्रयुक्त खीर और उसी साठ़ी चावल के आटे से ही "डाला छठ" पूजा के लिये शुद्ध देशी घी में ठेकूवा प्रसाद तैयार किया जाता रहा।"
और, बांस के डलिए भरे फलों में शाक सहित रसदार फल भी होते हैं : केला, अनार, संतरा, नाशपाती, नारियल, टाभा, शकरकंदी, अदरक, हल्दी और काला धान जिसे साठी कहते हैं और जिसका चावल लाल होता है, अक्षत के रूप में प्रयोग होता है। श्रीफल, सिंघाड़ा, नींबू, मूली, पानी फल अन्नानास... सबके सब ऋतु उत्पाद।
ईख का तोरण द्वार और बांस की टोकरी... यह सब वंश पूर्वक अर्चना है। फिर, चवर्णक और मसालों में गिनिए : पान, सुपारी, लोंग, इलायची, सूखा मेवा... है न रोचक तथ्य और सत्य। प्रकृति ने जो कुछ हमें दिया, उसका अंश हम उत्पादक शक्तियों को निवेदित करके ही ग्रहण करें। यह भाव भारतीयों का अनुपम विचार है जिसका समर्थन गीता भी करती है।
छठ मैया के लोकगीतों का अपना गौरव और गणित है लेकिन गीत अगणित हैं। उनमें सूर्य नमस्कार के रूप में सुंदर भाव है। सूर्य के बल रूप में जोड़, ताप शमन के रूप में बाकी, अपेक्षा के रूप में गुणा और अनुग्रह के रूप में भाग का भाव मिलता है :
छठी मैया के रोपल जीरवा
जीरवा लहसत जाय,
जीरवा लहसत जाय।
जीरा के रखवार सूरजमल
जीरा लहले सिहोर,
जीरा लहले सिहोर...।
और भी गीत गाये जाते है जिनमें गंगा है, गंगा की लहरें, पवित्र जलधारा, हिलोर, नैया, नाविक आदि भी हैं, जैसे :
गंगाजी बहेली झराझर
नइयां आवै बहुत, नइयां आवै बहुत।
कलसुपवा भरल नइयां
आवै बहुत नइयां आवै बहुत...।
(आलेख : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू')
सलूम्बर ब्लॉग
No comments:
Post a Comment