Saturday, 2 October 2021

सुलगते सवाल और महात्मा गांधी के विचार

Salumbar Blog संकलन- स्वराज करुण
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जयंती के अवसर पर आइए आज देश के विभिन्न सुलगते सवालों के जवाब उनके विचारों में ढूंढने की कोशिश करें.

आख़िर कब आएगी आर्थिक समानता ?
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आर्थिक समानता के लिए काम करने का मतलब है- पूंजी और मजदूरी के बीच के झगडों को हमेशा के लिए मिटा देना. इसका अर्थ यह होता है कि एक ओर जिन मुट्ठी भर पैसे वालों के हाथ में राष्ट्र की सम्पत्ति का बड़ा भाग इकट्ठा हो गया है, उनकी सम्पत्ति  को कम करना और दूसरी ओर जो करोड़ों लोग आधे पेट खाते और नंगे रहते हैं, उनकी सम्पत्ति में वृद्धि करना. जब तक मुट्ठी भर धनवानों और करोड़ों भूखे रहने वालों के बीच बेइन्तहा अन्तर बना रहेगा, तब तक अहिंसा की बुनियाद पर चलने वाली राज व्यवस्था कायम नहीं हो सकती. आजाद हिन्दुस्तान में देश के बड़े-से-बड़े धनवानों के हाथ में हुकूमत का जितना हिस्सा होगा, उतना ही गरीबों के हाथ में भी होगा और तब नयी दिल्ली के महलों और उनकी बगल में बसी हुई गरीब मजदूर बस्तियों के टूटे-फूटे झोपड़ों के बीच जो दर्दनाक फर्क आज नज़र आता है, वह एक दिन को भी नहीं टिकेगा.
            
आर्थिक समानता का मतलब ?
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अगर धनवान लोग अपने धन को और उसके कारण मिलने वाली सत्ता को खुद राजी-खुशी से छोड़कर और सबके कल्याण के लिए सबके साथ मिलकर बरतने को तैयार न होंगे तो यह तय समझिए कि हमारे देश में हिंसक और खूंखार क्रान्ति हुए बिना नहीं रहेगी. आर्थिक समानता का मतलब है- जगत में सबके पास समान सम्पत्ति का होना. यानी सबके पास इतनी सम्पत्ति का होना, जिससे वे अपनी कुदरती आवश्यकताएं पूरी कर सकें. पूर्ण आदर्श तक हम कभी नहीं पहुँच सकते, मगर उसे नज़र में रखकर हम व्यवस्था करें. जिस हद तक हम इस आदर्श को पहुँच सकेंगे, उसी हद तक सुख और संतोष प्राप्त करेंगे और उसी हद तक सामाजिक अहिंसा सिद्ध हुई कही जा सकती है. अहिंसा द्वारा यह आर्थिक समानता कैसे लायी जा सकती है ? इसका विचार करें.      

देश की ग़रीब प्रजा से करें अपनी तुलना
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पहला कदम यह है कि जिसने इस आदर्श को अपनाया हो, वह अपने जीवन में आवश्यक परिवर्तन करे. हिन्दुस्तान की गरीब प्रजा के साथ अपनी तुलना करके अपनी आवश्यकताएं कम करे. अपनी धन कमाने की शक्ति को नियंत्रण में रखे. जो धन कमाए, उसे ईमानदारी से कमाने का निश्चय करे. सट्टे की वृत्ति हो तो उसका त्याग करे. घर भी अपनी सामान्य आवश्यकता पूरी करने लायक रखे और जीवन को हर तरह से संयमी बनाए. अपने जीवन में सम्भव सुधार कर लेने के बाद अपने मिलने-जुलने वाले और अपने पड़ोसियों में समानता के आदर्श का प्रचार करे.
(उनके विचार संकलन  'मेरे सपनों का भारत' से साभार )

अधिकारों के लिए हिंसा काँटों भरा रास्ता
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अधिकार प्राप्त करने के लिए हिंसा का आश्रय लेना शायद आसान मालूम हो, किन्तु  यह रास्ता अन्त में काँटों वाला सिद्ध होता है. जो लोग तलवार द्वारा जीवित रहते हैं. वे तलवार से ही मरते हैं. तैराक अक्सर डूबकर मरता है. यूरोप की ओर देखिए वहां कोई सुखी दिखाई नहीं देता, क्योंकि किसी को भी संतोष नहीं है. मजदूर पूंजीपति का विश्वास नहीं करता और पूंजीपति को मजदूर में विश्वास नहीं है. दोनों में एक प्रकार की स्फूर्ति और ताकत है, लेकिन वह तो बैलों में भी होती है. बैल भी मरने की हद तक लड़ते हैं. कैसी भी गति प्रगति नहीं है. हमारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि यूरोप के लोग प्रगति कर रहे हैं. उनके पास जो पैसा है, उससे यह सूचित नहीं होता कि उनमें कोई नैतिक या आध्यात्मिक सदगुण है. दुर्योधन असीम धन का स्वामी था, लेकिन विदुर या सुदामा की तुलना में वह गरीब ही था. आज दुनिया विदुर और सुदामा की पूजा करती है, लेकिन दुर्योधन का नाम तो उन सब बुराइयों के प्रतीक के रूप में ही याद किया जाता है, जिनसे आदमी को बचना चाहिए .
(उनके विचार संकलन 'मेरे सपनों का भारत' से साभार )

लोग वकील क्यों बनते हैं ?
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लोग दूसरों का दुःख दूर करने के लिए नहीं, बल्कि पैसा पैदा करने के लिए वकील बनते हैं. वह एक कमाई का रास्ता है. इसलिए वकील का स्वार्थ झगड़ा बढ़ाने में है. यह तो मेरी जानी हुई बात है कि जब झगड़े होते हैं तब वकील खुश होते हैं. मुख्तार लोग भी वकील की जात के हैं. जहां झगड़े नहीं होते  वहाँ भी वे झगड़े खड़े करते हैं. उनके दलाल जोंक की तरह गरीब लोगों से चिपकते हैं और उनका खून चूस लेते हैं .
(उनकी पुस्तक 'हिन्द स्वराज' से साभार )

शहरवासियों ने किया ग्रामीणों का शोषण
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मेरा विश्वास है और मैंने इस बात को असंख्य बार दुहराया है कि भारत अपने चन्द शहरों में नहीं, बल्कि सात लाख गाँवों में बसा हुआ है. लेकिन हम शहरवासियों का ख्याल है कि भारत शहरों में ही है और गाँवों का निर्माण शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिये ही हुआ है. हमने कभी यह सोचने की तकलीफ नहीं उठायी कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढँकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं, और धूप तथा वर्षा से बचने के लिये उनके सिर पर छप्पर है या नहीं ?
मैंने पाया है कि शहरवासियों ने आम तौर पर ग्रामवासियों का शोषण किया है. सच तो यह है कि वे गरीब ग्रामवासियों की ही मेहनत पर जीते हैं. शहर अपनी हिफाजत आप कर सकते हैं. हमें तो अपना ध्यान गांवों की ओर लगाना चाहिए ।
गाँवों और शहरों के बीच स्वास्थ्यपूर्ण और नीतियुक्त सम्बन्ध निर्माण तब होगा, जबकि शहरों को अपने इस कर्त्तव्य का ज्ञान होगा कि उन्हें गाँवों का स्वार्थ के लिये शोषण करने के बजाय, गाँवों से जो शक्ति और पोषण वे प्राप्त करते हैं, उसका पर्याप्त बदला देना चाहिए ।
(उनके विचार संकलन  'मेरे सपनों का भारत' से साभार)

अंग्रेजी शिक्षा यानी गुलामी
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करोड़ों लोगों को अंग्रेजी की शिक्षा देना उन्हें गुलामी में डालने जैसा है. मैकाले ने शिक्षा की जो बुनियाद डाली, वह सचमुच गुलामी की बुनियाद थी. अंग्रेजी शिक्षा लेकर हमने अपने राष्ट्र को गुलाम बनाया है.अंग्रेजी शिक्षा से दम्भ, राग, ज़ुल्म वगैरह बढे हैं. अंग्रेजी शिक्षा पाए हुए लोगों ने प्रजा को ठगने में, उसे परेशान करने में कुछ भी नहीं उठा रखा है. क्या यह कम ज़ुल्म की बात है कि अपने देश में अगर मुझे इन्साफ पाना हो, तो मुझे अंग्रेजी भाषा का उपयोग करना चाहिए! बैरिस्टर होने पर मै स्वभाषा में बोल ही नहीं सकता ! दूसरे आदमी को मेरे लिए तर्जुमा (अनुवाद) कर देना चाहिए ! यह क्या कुछ कम दम्भ है ? यह गुलामी की हद नहीं तो और क्या है? हिन्दुस्तान को गुलाम बनाने वाले तो हम अंग्रेजी जानने वाले लोग ही हैं ! राष्ट्र की हाय अंग्रेजों पर नहीं पड़ेगी, बल्कि हम पर पड़ेगी !
(उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ' हिन्द स्वराज्य' से साभार)

***** सलूम्बर ब्लॉग *****

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