Sunday, 28 November 2021

शुक्लगिरी महाराज का षोडशी भण्डारा आयोजित

✍️ सलूम्बर ब्लॉग | Salumbar Blog |
28.11.21 | उदयपुर रोड स्थित वैद्यनाथ धूणी के दिवंगत महंत शुक्लगिरी महाराज का दो दिवसीय षोडशी भण्डारा कार्यक्रम रविवार को धूमधाम से सम्पन्न हुआ। इस दौरान हुए सन्त समागम में मेवाड़ वागड़ के विभिन्न मठ मंदिरों के दर्जनों साधु-महात्मा शामिल हुए।
दो दिवसीय कार्यक्रम के तहत शनिवार सवेरे से धूणी पर संतों का आगमन शुरू हो गया। संध्या आरती के बाद महंत घनश्याम गिरी के सानिध्य में रात्रि जागरण, भजन कार्यक्रम हुआ। मेवल के प्रसिद्ध लोक भजन गायक शंकरपुरी सहित अन्य श्रद्धालुओं ने भी भक्ति धुनों पर प्रस्तुतियां दी।

रविवार दोपहर संगेसरा मठ के महंत रामचन्द्र गिरी महाराज के सान्निध्य में शुक्लगिरी महाराज की समाधि पर पूजन कर भोग धराया गया। इसके बाद सोलह साधुओं को इतनी ही वस्तुओं का दान कर भोजन कराया गया।

श्रद्धालुओं ने महंत घनश्याम गिरी, रविकांत महाराज का माल्यापर्ण कर आशीर्वाद लिया। इस दौरान पांडाल गुरुदेव के जयकारों से गूंजता रहा। शिवानंद गिरी, ओम पुरी, अनिरूद्ध गिरी महाराज सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद थे।

Thursday, 25 November 2021

अब पाकिस्तानी भी खोज रहे हैं काफिरों में अपने पुरखे

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पाकिस्तान का जब निर्माण हुआ तो पाकिस्तान के इतिहास से इस्लाम के पूर्व के इतिहास का पूर्णतः सफाया कर दिया गया। पाकिस्तान के काॅलेजों और स्कूलों में जो इतिहास पढ़ाया जाता था उसकी शुरूआत ही मोहम्मद बिन कासिम के हमले से होती थी। मगर अब पाकिस्तान के बुद्धिजीवी अपने इतिहास और पुरखों को इस्लाम के पूर्व के युग में तलाशने में जुट गए हैं। अब उन्हें आचार्य चाणक्य, सम्राट पोरू और राजा दाहर में अपने पूर्वज नजर आने लगे हैं। पाकिस्तान के पांच विश्वविद्यालय के इतिहास विभागों ने इस्लाम से पूर्व इतिहास और संस्कृति के अनुसंधान के लिए 24 परियोजनाएं शुरू की हैं।

पाकिस्तान के विख्यात् बुद्धिजीवी शैफ ताहिर ने इस बात पर शोक व्यक्त किया है कि पाकिस्तान के पुरखों में आचार्य चाणक्य का नाम क्यों शामिल नहीं है। उन्होंने कहा है कि धर्म और मजहब के आधार पर इतिहास का विभाजन किसी भी राष्ट्र और नस्ल के लिए बेहद खतरनाक है। उन्होंने कहा कि हम पाकिस्तानी होते हुए तक्षशिला विश्वविद्यालय और आचार्य चाणक्य की महानता से मुंह नहीं मोड़ सकते। वह हमारे इतिहास और सभ्यता का एक अंग हैं। उन्होंने दावा किया कि आचार्य चाणक्य का जन्म हरीपुर हजारा के एक गांव मोरढूह में हुआ था।

इससे पूर्व पाकिस्तान की एक अन्य बुद्धिजीवी फौजिया सईद ने पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर यह दावा करके सनसनी पैदा कर दी थी कि पाकिस्तान की अधिकांश जनसंख्या के पूर्वज हिन्दू थे और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया गया था। पाकिस्तान के एक अन्य इतिहासकार शाहिद शब्बीर ने एक विशेष कार्यक्रम प्रसारित किया है। जिसमें कहा है कि महाराजा पोरू पाकिस्तानियों के पूर्वज थे और उनकी राजधानी  रावलपिंडी के कुरी के स्थान पर थी। उन्होंने प्राचीन दुर्ग के अवशेषों को अपने कार्यक्रम में प्रस्तुत किए हैं।

हाल मे लाहौर मे पाकिस्तानी संस्था "जीवे पंजाब" ने पुरू दिवस मनाया।  एक दर्जन से अधिक पंजाबी बुद्धि जीवियो ने कहा पंजाब के भूमि पुत्र ही हमारे असली हीरो है। पंजाब पर हमला करने वाला कोई भी हमलावर हमारा हीरो नही हो सकता। इस बैठक मे एक प्रस्ताव पारित करके पाकिस्तान से मांग की गई कि झेलम मे महाराज पुरू की मूर्ति स्थापित की जाए।

सिंध विश्वविद्यालय के एक ऐतिहासिक अन्वेषक लतीफ लुगारी ने एक अनुसंधान पत्र हैदराबाद सिंध विश्वविद्यालय की गोष्ठी में प्रस्तुत किया जिसमें सिंध के अंतिम हिन्दू सम्राट राजा दाहिर के शौर्य की शानदार शब्दों में प्रशंसा की गई है। उन्होंने अपने भाषण में सिंध प्रदेश में राजा दाहिर की पुरानी राजधानी के भग्नावेषों का वीडियो भी पेश किया है। उन्होंने कहा कि एक सिंधी होने के नाते उन्हें राजा दाहिर पर गर्व है।

हाल में ही पेशावर विश्वविद्यालय में इस्लाम से पूर्व के पाकिस्तानी इतिहास पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया था जिसमें दस अनुसंधान पत्र ब्राह्मणशाही के राजाओं के बारे में पेश किए गए। इस गोष्ठी में एक विद्वान मोहम्मद सईद ने हुंजा के काफिर कबीले पर एक अनुसंधान पत्र पेश करते हुए दावा किया कि यह कबीला विशुद्ध आर्यन रक्त का है और आज भी इसमें जो भाषा बोली जाती है वो प्राचीन संस्कृत का ही एक रूप है।

आलेख साभार : श्री मनमोहन शर्मा (वयोवृद्ध पत्रकार)

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Wednesday, 10 November 2021

छठ पूजा : आस्था के साथ वनस्पति का सम्मान

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न कार्तिक समो मास... सचमुच कार्तिक मास पूरा ही प्रकृति में वनस्पति, औषध, कृषि और उसके उत्पाद के ज्ञान की धारा लिए है। अन्नकूट के मूल में जो धारणा रही, वह इस ऋतु में उत्पादित धान्य और शाक के सेवन आरंभ करने की भी है। अन्न बलि दिए बिना खाया नहीं जाता, इसी में भूतबलि से लेकर देव बलि तक जुड़े और फिर गोवर्धन पूजा का दिन देवालय - देवालय अन्नकूट हो गया।

छठ पर्व इस प्रसंग में विशिष्ट है कि कुछ फल इसी दिन दिखते है। डलिए, छाब और छाभ भर भरकर फल निवेदित किए जाते हैं, सूर्य को निवेदित करने के पीछे वही भाव है जो कभी मिस्र, ग्रीक और यूनान तक रहा। सबसे प्रभावी ज्योतिर्मय देव को उत्पाद का अंश दान। छठ तिथि का ध्यान ही फलमय हुआ क्योंकि छह की संख्या छह रस की मानक है। भोजन, स्वाद और रस सब षट् रस हैं। इस समय जो भी फल होते हैं, वो बिना चढ़ाए महिलाएं खाती नहीं है। 

विद्वान श्री अत्रि विक्रमार्क एक अलग बात भी कहते हैं षष्ठी (मातृका और कार्तिक मास) के बारे में। भाद्रपद शुक्ला षष्ठी हल-षष्ठी नाम से मनती है, यह तिथि बलराम के जन्मदिन से संयुक्त भी मानी गई है, इस दिन महिलायें हल से उत्पन्न अन्न नहीं खाती हैं। इसके 60 दिनों बाद मनाई जाने वाली डाला-छठ भी ऐसा व्रत है जिसमें निराहार रहती हैं। उपज का षष्ठांश राजा ले जाता था, हल षष्ठी एवं डाला छठ 60 दिनों में उत्पन्न होने वाली धान की सस्य से जुड़ा हुआ लगता है, एवं षष्ठांश प्रकृति राजा को दिया जाने वाला कर।

चातुर्मास के व्रतों में प्राजापत्यादि व्रत में अन्तिम ३ दिन निराहार रहकर व्रत का निर्देश पुराणों में प्राप्त है। डालाछठ में भी 3 दिनों का व्रत उन्हीं व्रतों का संक्षिप्त रूप ही है। इस टिप्पणी के प्रत्युत्तर में नेपाल देश निवासी श्री उद्धब भट्टराई अपनी स्मृति लिखते हैं कि -
"जी बिल्कुल सत्य तथ्य आधारित है। मुझे याद है पहले हमारे यहां साठी प्रजाति के धान की चावल से ही आज की शाम भोग में प्रयोग होनेवाली रसीआव रोटी वाली गुड़ प्रयुक्त खीर और उसी साठ़ी चावल के आटे से ही "डाला छठ" पूजा के लिये शुद्ध देशी घी में ठेकूवा प्रसाद तैयार किया जाता रहा।"

और, बांस के डलिए भरे फलों में शाक सहित रसदार फल भी होते हैं : केला, अनार, संतरा, नाशपाती, नारियल, टाभा, शकरकंदी, अदरक, हल्दी और काला धान जिसे साठी कहते हैं और जिसका चावल लाल होता है, अक्षत के रूप में प्रयोग होता है। श्रीफल, सिंघाड़ा, नींबू, मूली, पानी फल अन्नानास... सबके सब ऋतु उत्पाद। 

ईख का तोरण द्वार और बांस की टोकरी... यह सब वंश पूर्वक अर्चना है। फिर, चवर्णक और मसालों में गिनिए : पान, सुपारी, लोंग, इलायची, सूखा मेवा... है न रोचक तथ्य और सत्य। प्रकृति ने जो कुछ हमें दिया, उसका अंश हम उत्पादक शक्तियों को निवेदित करके ही ग्रहण करें। यह भाव भारतीयों का अनुपम विचार है जिसका समर्थन गीता भी करती है। 

छठ मैया के लोकगीतों का अपना गौरव और गणित है लेकिन गीत अगणित हैं। उनमें सूर्य नमस्कार के रूप में सुंदर भाव है। सूर्य के बल रूप में जोड़, ताप शमन के रूप में बाकी, अपेक्षा के रूप में गुणा और अनुग्रह के रूप में भाग का भाव मिलता है :
छठी मैया के रोपल जीरवा
जीरवा लहसत जाय,
जीरवा लहसत जाय।
जीरा के रखवार सूरजमल
जीरा लहले सिहोर, 
जीरा लहले सिहोर...।

और भी गीत गाये जाते है जिनमें गंगा है, गंगा की लहरें, पवित्र जलधारा, हिलोर, नैया, नाविक आदि भी हैं, जैसे : 
गंगाजी बहेली झराझर 
नइयां आवै बहुत, नइयां आवै बहुत।
कलसुपवा भरल नइयां 
आवै बहुत नइयां आवै बहुत...।
(आलेख : डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू')
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शरद पूर्णिमा के लिए पौराणिक भारतीय आयुर्वेद का विशेष योग

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