Sunday, 14 January 2018

आपको नही होगा पताः तिल के आयुर्वेदिक एवं औषधीय गुण .. मकर संक्रांति विशेष

तिल के आयुर्वेदिक एवं औषधीय गुण

मकर संक्रांति विशेष
तिल तीन प्रकार के होते हैंः काले, सफेद और लाल। लाल तिल का प्रयोग कम किया जाता है। काले तिलों का प्रयोग भारतीय समाज में पूजा पाठ में होता आया है। और काले तिल ही सेहत के लिए कारगर होते हैं। भारतीय खानपान में तिलों का बहुत महत्व है। सर्दियों के मौसम में तिल खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर सक्रिय रहता है। तिलों में कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्लेमिक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्वन पाये जाते हैं। तिल में मोनो-सैचुरेटेड फैटी एसिड होता है जो शरीर से बैड कोलेस्ट्रोल को कम करके गुड कोलेस्ट्रोल यानि एच.डी.एल. को बढ़ाने में मदद करता है। यह हृदय रोग, दिल का दौरा और धमनीकलाकाठिन्य की संभावना को कम करता है। तिलों का सेवन करने से तनाव दूर होता है और मानसिक दुर्बलता नही होती। प्राचीन समय से खूबसूरती बनाये रखने के लिए तिलों का प्रयोग किया जाता रहा है। तिलों का तेल भी बहुत फायदेमंद होता है। आइए हम आपको तिलों के औषधीय गुणों के बारे में बताते हैं। तिलों में पोषक तत्व भरपूर मात्रा में होता है। और इसमें विटामिन बी भी पाया जाता है। कफ जैसी बीमारी को दूर करने में तिल का सेवन करना फायदेमंद है। तिलों के सेवन से भूख बढ़ती है। और यह आपके नर्वस सिस्टम को बल देता है। यह वात, पित्त और कफ को नष्ट करता है। तिलों का तेल शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद है। क्योंकी यह एक आक्सीडेंट है। तिल के तेल से शरीर में मालिश करने से शरीर में बुढ़ापा जल्दी नहीं आता। इसकी मालिश करने से थकावट भी दूर होती है। यह बालों को काला, घना और मजबूत बनाता है। ह त्वचा को सनबर्न से मुक्ति दिलाता है। सर्दियों में तिल के तेल को त्वचा पर लगाने से त्वचा का रूखापन दूर होता है। और चेहरे में कांती आती है।


तिल के औषधीय गुण 

कैंसर से सुरक्षा प्रदान करता हैः तिल में सेसमीन नाम का एन्टीऑक्सिडेंट होता है जो कैंसर के कोशिकाओं को बढ़ने से रोकने के साथ-साथ है और उसके जीवित रहने वाले रसायन के उत्पादन को भी रोकने में मदद करता है। यह फेफड़ों का कैंसर, पेट के कैंसर, ल्यूकेमिया, प्रोस्टेट कैंसर, स्तन कैंसर और अग्नाशय के कैंसर के प्रभाव को कम करने में बहुत मदद करता है।
तनाव को कम करता हैः इसमें नियासिन नाम का विटामिन होता है जो तनाव और अवसाद को कम करने में मदद करता है।
हृदय के मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
तिल में जरूरी मिनरल जैसे कैल्सियम, आयरन, मैग्नेशियम, जिन्क, और सेलेनियम होता है जो हृदय के मांसपेशियों को सुचारू रूप से काम करने में मदद करता है और हृदय को नियमित अंतराल में धड़कने में मदद करता है।
शिशु के हड्डियों को मजबूती प्रदान करता हैः तिलों में डायटरी प्रोटीन और एमिनो एसिड होता है जो बच्चों के हड्डियों के विकसित होने में और मजबूती प्रदान करने में मदद करता है। उदाहरणस्वरूप 100ग्राम तिलों में लगभग 18 ग्राम प्रोटीन होता है, जो बच्चों के विकास के लिए बहुत जरूरी होता है।
गर्भवती महिला और भ्रूण को स्वस्थ रखने में मदद करता है- तिलों में फोलिक एसिड होता है जो गर्भवती महिला और भ्रूण के विकास और स्वस्थ रखने में मदद करता है।
शिशुओं के लिए तेल मालिश के रूप में काम करता हैः अध्ययन के अनुसार तिल के तेल से शिशुओं को मालिश करने पर उनकी मांसपेशियाँ सख्त होती है साथ ही उनका अच्छा विकास होता है। आयुर्वेद के अनुसार इस तेल से मालिश करने पर शिशु आराम से सोते हैं।
अस्थि-सुषिरता से लड़ने में मदद करता है- तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।
डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज के स्तर को 36ः कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (जलचम 2 कपंइमजपब) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।
गर्भाशय की पीड़ा- तिलों को बारीक पीसकर तिल के ही तेल में मिला किंचित् गर्म करके नाभि के भाग में धीरे धीरे लेप करने या मलने (मर्दन करने) से शीत जन्यपीड़ा शान्त हो जाती है।
प्रमेह- तिल तथा अजवायन को दो एक के अनुपात में मिलाकर पीस लें और समान मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करवायें।
रक्त स्त्राव- प्रसूती या गर्भवती महिला के योनी मार्ग से रक्त निकलना बन्द नही हो तो तिल व जौ को कुटकर शक्कर मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए।
रक्तार्श- लगभग 50 ग्राम काले तिलों को सोखने योग्य पानी में भिगोये। लगभग 30 मिनट जल में भीगे रहने के बाद उन्हें पीसकर उसमें लगभग एक चम्मच मक्खन एंव दो चम्मच मिश्री मिला दें। इसका प्रतिदिन दो बार सेवन करने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) में लाभ होता है।
पेट दर्द-  20-25 ग्राम साफ तिल चबाकर उपर से गर्म पानी पिलाने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है। साथ ही तिलों को पीसकर लम्बा सा गोला बनाकर उसे तवे पर सहन करने योग्य करके पेट के उपर फिराने से अत्यन्त से अत्यन्त कष्टदायी पेट का दर्द (उदर शूल) भी शान्त हो जाता है।
कब्ज- लगभग 60 ग्राम तिल लेकर उन्हे कूट लें फिर उनमें कोई मिष्ठान मिला लें। इसे खाने से कब्ज का नाश होता है।
सुखी खासी- यदि सर्दी के कारण सूखी खासी हो तो 4-5 चम्मच मिश्री एंव इतने ही तिल मिश्रित कर ले। इन्हे एक गिलास मे आधा पानी रहने तक उबाले। इसे प्रतिदिन प्रातः साय एंव रात्री के समय पीये।
आग से जलना- तिल जल में चटनी की भाती पीस लें। इस का दग्ध जले स्थान पर मोटा लेप करने से जलन शान्त हो जाती है।
मानसिक दूर्बलता- तिल गुड दोनो सममात्रा में लेकर मिला लें।उसके लड्डू बना ले। प्रतिदिन 2 बार 1-1 लड्डू दूध के साथ खाने से मानसिक दुर्बलता एंव तनाव दूर होते है। शक्ति मिलती है। कठिन शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलना जल्दी बुढ़ापा आना बन्द हो जाता है।
दंत चिकित्सा- प्रातः काल तथा साय काल लगभग 50-50 ग्राम की मात्रा में (बिना मिठा मिलाये) धीरे धीरे काले तिल चबाकर उपर से पानी पीने से दात मजबूत मल रहित हो जाते है। और हिलते हुए दात भी पुनः जम जाते है।
पथरी- तिल क्षार को रोग की दशानुसार देशी शहद में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से पथरी रोग में लाभ होता है।
तिल आपके दांतों के लिए भी बहुत लाभकारी है। यह दातों को मजबूत और चमकदार बनाता है। आपको सुबह ब्रश करने के बाद काले तिलों को बारीक चबाकर खाना चाहिए यह प्राकृतिक रूप से दांतों को सुंदर और मजबूत बनाता है। यदि दांत में दर्द हो तो थोड़ा सा तिल के तेल से मुंह में कुला करें। दांतों के दर्द में राहत देता है।
तिल के तेल को सिर पर लगाने से आपकी बालों की समस्या तो दूर होती ही है, साथ के साथ यह बालों का झड़ना, उनका सफेद होना और गंजेपन की शिकायत दूर करता है।
इस तरह से तिलों को सेवन करने से आपको फायदा होगा। तिलों में बहुत ताकत होती है। सर्दियों में खासतौर पर तिलों का सेवन आप किसी न किसी रूप में जरूर करते रहें।

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