Sunday, 14 January 2018

अंगुठे में समाये पारम्परिक खेल

अंगुठे में समाये पारम्परिक खेल












नरोत्तम पुरोहित 
सुर्य के उत्तरायण में आने पर मनाया जाने वाला पर्व मकर सक्रांति है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन तीर्थ स्नान, दान पुण्य और सुर्य आराधना का विषेष महत्व है। इसी के साथ इस दिन अपने-अपने क्षेत्र के अनुरूप विभिन्न प्रारम्परिक खेलों को खेलने का भी विषेष महत्व है। गुजरात व इसके सिमावर्ती राजस्थान के कई जिलो में पतंगबाजी का लुप्त उठाया जाता है। मेवाड़, छप्पन व मेवल के इस क्षेत्र में सक्रांति के दिन युवक युवतियां सितोलिया, गील्ली दण्डा, मार धडाधड, हाॅकी के तर्ज पर खेले जाने वाला गेडीया खेल का आनन्द लेने में मस्त नजर आते थे। लेकिन बिते कुछ वर्षो से यह पारम्परिक खेल विलुप्तता की कगार पर खडे नजर आ रहे है। शरीर को चुस्त और तंदुरूस्त बनाने वाले इन पारम्परिक खेलो से आज की युवा पीढ़ी ने शायद मुह ही मोड़ दिया है और स्क्रीन को ही अपनी दुनिया समझने वाली यह युवा पिढ़ी इसमें मदमस्त होती नजर आ रही है। यही नही स्क्रीन की इस दुनिया में अपने कई पारम्परिक खेल भी सम्मिलित हो चुके है। जिसे युवा मोबाईल, कम्प्युटर में खेलते नजर आते है जिसे देख लगता है आज की युवा पीढ़ी के लिए पारम्परिक खेल अंगुठे में समाये हुए है। लेकिन हर परिवार को अपने युवाओं को चुस्त और तंदुरूस्त रखने के लिए फुटबाॅल, हाॅकी, कबड्डी के साथ अपने पारम्परिक खेलो की और रूख करवाना चाहिए। विभिन्न स्वयं सेवी संगठनों, संस्थाओं, क्लबों को खेल प्रतियोगिताएं आयेाजित करनी चाहिए। हालांकि विभिन्न सामाजिक व धार्मिक संगठन विभिन्न खेल प्रतियोगिताएं आयोजित करते है परन्तु इन प्रतियोगिताओं में अपने पारम्परिक खेलो को प्राथमिकता से जोड़े जाने की आवष्यकता है।

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