सलूंबर जिला: जायज मांग है या चुनावी मुद्दा!
राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर उठ रहे सवाल
विषेष संपादकीय: बी.एल. पुरोहित
मेवाड के स्वर्णिम इतिहास का महत्वपूर्ण ठिकाना सलूंबर आज अपने मजबुत राजनीतिक प्रतिनिधित्व को तरस सा रहा है। यहां हमने कडी से कडी जोडकर भी देख ली। लेकिन हालात और भी चिंताजनक हुए लग रहे है। प्रदेष सरकार के 4 साल पूरे कहे या चुनावी वर्ष, हम इसी दौर से गुजर रहे है। हाल ही सीएम वसुंधरा ने प्रदेष में 5 नये जिलों का मानस बनाया है। इसे लेकर गत दिनों मिडिया में खबरें भी प्रकाषित हुई। हालांकि नए जिलों की अधिकृत घोषणा नहीं हुई लेकिन इन जिलों में सलूंबर का नाम गायब है। जबकि तीन दषक से ज्यादा समय से सलूंबर की यह सबसे बडी मांग बनकर उभरा है। जनजाति बाहुल्य क्षैत्र के इस मुख्यालय की यह जायज मांग है।
लेकिन क्या वाकई यह मांग जायज है! हाल के दिनों के घटनाक्रम से इस मांग पर सवालिया निषान लग गए है। जबकि इस मांग को लेकर यहां की जनता ने शायद अब तक उतना तो किया ही है जितना किया जा सकता था। किंतु फिर भी जिले की दौड में प्रदेष में अव्वल माने जाने वाले सलूंबर को अपना हक नहीं मिल पा रहा है, गत दिनों आई नए जिले की खबरों पर मुहर लगती है तो आषंका है कि सलूंबर को जिलो की दौड से ही बाहर कर दिया जाए।
नगर पालिका, पंचायत समिति, विधानसभा, लोकसभा चुनाव में भाजपा को चुनते हुए लोगों ने विकास की कडी जोडी है। फिर जिले की दौड में सलूंबर हारा, थका क्यों नजर आ रहा है। बात केवल अधिकृत घोषणा पर अटकी है जो सरकार कभी भी करके चैका सकती है, जैसा कि सरकार करती भी आई है। तो अब कहां है वह भाषण, वक्तव्य, घोषणाएं, वादं, आष्वासन देने वाले हमारे प्रतिनिधि, कोई बोल क्यूं नहीं रहा। क्या बोले, क्यों बोले! क्या हमारे जनप्रतिनिधियों के लिये भी ‘सलूंबर जिला’ एक जायज मांग नहीं केवल एक चुनावी मुद्दा बन चुका है। यही कारण है कि जिले के लिए आंदोलन, मुहिम तो विभिन्न संगठन समय-समय पर चलाते आए है लेकिन हमारे नेताओं ने इनसे दूरी बनाए रखने का ही प्रयास किया। जबकि चुनावों में हमारे जनप्रतिनिधि ही इसे चुनावी मुद्दा बनाकर बयानवीर बन अपना काम निकाल लेते है। कमोबेष यही रवैया विपक्षी कांग्रेस का भी रहा है। यह साफ लग रहा है कि हमारे चुने गए प्रतिनिधि हमारी जायज मांग को लेकर गंभीर नहीं है। जिन्हें हमने मत, समर्थन व बहुमत ही नहीं स्पष्ट जनमत दिया है। इसके बावजुद आज सलूंबर कई मुद्दों, मुख्यतः जिले की घोषणा में पिछडता दिख रहा है। बेषक! मजबुत राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी है। हमारे नेताओं, जनप्रतिनिधीयो को यह स्पष्ट रूप से सोच लेना चाहिए की जिन मुद्दो, वादों का लंबे समय से केवल चुनावी दोहन किया है अगर उन्हें पुनः चुनाव में लेकर उतरे तो जनता इस बार उनसे सवाल करे या नहीं करे लेकिन वोट के रास्ते जवाब जरूर देगी यह तय है।
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