बैरका : आदिवासी परंपरा का अनूठा रक्षा-सूत्र
Salumbar Blog | सलूम्बर ब्लॉग
बहनों से बड़ा परिवार का सुरक्षा कवच कौन होगा! वे भाई के लिए चिरायुष्य चाहती हैं। भाभी के लिए चूड़ा, चूनर का भाग्य चाहती हैं। भाई से वे बहन हैं और बहन हैं तो भाई भाई हैं।
बस्ती के हर पथ पर थिरक कर उसने महामारी को दूर किया और समृद्धि का आह्वान किया है। रायों ने गायों को कामधेनु किया है! लज्जा और धज्जा गौरज्या को लेकर भाई पीहर और ससुराल के घर घर खुशी बांट रहा है।
लोक परम्पराविद डॉ. श्री कृष्ण जुगनू बताते है कि भादौ की ग्यारस (डोल एकादशी, जल झिलनी एकादशी) को बहनें वारी जाती हैं। फूली नहीं समातीं! वह मांजाये भाई के लिए नारियल की चटकों की माला लेकर पहुंचती है और अपने हाथों उसकी भुजा पर बांधती है!
यह माला " बैरका " कही जाती है। भाई की दोनों भुजा पर बहनों द्वारा बांधा यह बैरका रक्षाबंधन से कम नहीं। भाइयों की भुजाएं शोभित होती हैं। वे इस दिन स्नान कर नारियल की इन चटकाें का ही फलाहार करते हैं।
#आदिवासीपरंपरा #tribalrituals #gavari #गवरी #मेवाड़भील #bheel #बैरका #bairka